जर्मनीः समाज में समाया हुआ है भेदभाव

जर्मनी में रहने वाले काले, एशियाई और मुस्लिम लोगों का कहना है कि वह त्वचा के रंग, जन्मस्थान और धर्म के नाम पर लगातार भेदभाव का शिकार होते हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

जर्मनी में रहने वाले काले, एशियाई और मुस्लिम लोगों का कहना है कि वह त्वचा के रंग, जन्मस्थान और धर्म के नाम पर लगातार भेदभाव का शिकार होते हैं.जर्मनी में गहरे रंग की त्वचा वाले लोगों, सिर पर स्कार्फ पहनने वाली मुस्लिम औरतों और जर्मन भाषा ना बोल पाने वाले लोगों के लिए तिरस्कार भरी नजरें और बेइज्जती भरे शब्द आम बात है. देश में भेदभाव के बहुत से रंग हैं और यह समाज में बहुत दूर तक समाया है.

यह जानकारियां नई नहीं हैं और ना ही इनमें हैरान करने जैसा कुछ है लेकिन नैशनल डिस्क्रिमिनेशन एंड रेसिज्म मॉनीटर रिपोर्ट से पहले इतने करीने से इन बातों को नहीं रखा गया. यह रिपोर्ट जर्मन सेंटर फॉर इंटीग्रेशन एंड माइग्रेशन रिसर्च ने बनाई है. इसके लिए नवंबर 2022 में 21,000 लोगों पर सर्वे किया गया.

रिपोर्ट बताती है कि जर्मनी में 54 प्रतिशत काले लोगों ने कम से कम एक बार रेसिज्म यानी नस्लभेद का सामना किया है. इसी समुदाय की हर पांच में से एक महिला ने बताया कि उन्हें एक साल के भीतर कई बार धमकाया गया या शोषण किया गया.

सर्वे में शामिल होने वालों में 14 फीसदी मुस्लिम महिलाएं हैं और 13 फीसदी एशियाई महिलाएं जिन्होंने इन दिक्कतों की बात की है. रेसिज्म मॉनीटर की निदेशक नाएका फोरूटान ने कहा, "बार-बार होने वाले भेदभाव और रेसिज्म के सेहत के लिए दुष्परिणाम होते हैं और इसका संबंध सरकारी संस्थाओं पर भरोसा टूटने से भी है. यह लोकतंत्र को कमजोर कर सकता है."

पुरुषों का अनुभव

41 फीसदी काले पुरुषों और 39 फीसदी मुस्लिम पुरुषों ने कहा कि उन्होंने पुलिस का सामना करते हुए नस्लभेदी व्यवहार झेला है. उनका कहना है कि सरकारी दफ्तरों में भी भेदभाव और रेसिज्म का अनुभव आम है. इसी तरह की स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं में भी है.

गहरे रंग वाली त्वचा के लोगों के लिए डॉक्टर से मिलने का वक्त लेना मुश्किल है और उनकी दिक्कतों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है. काले, मुस्लिम और एशियाई लोगों का कहना है कि उन्होंने बुरे बर्ताव के डर से इलाज में देरी की या टाल दिया या फिर जल्दी-जल्दी डॉक्टर बदल डाले.

रेसिज्म मॉनीटर की सह-निदेशक फ्रांक काल्टेर कहती हैं, हमारा डाटा दिखाता है कि "भेदभाव के अनुभव और रेसिज्म बहुत ही स्पष्ट तरीके से, चिंता या डिप्रेशन के लक्षणों से जुड़े हैं." नेताओं और समाज के लिए उनका सुझाव है कि इसकी रोकथाम के उपाय विकसित किए जाएं ताकि प्रभावित लोगों और नागरिक संस्थाओं की मदद की जा सके "जो लोकतांत्रिक और स्वतंत्र समाज के लिए हर दिन काम कर रहे हैं."

फेडरल गर्वनमेंट कमिश्नर फॉर इंटीग्रेशन रीम आलाबाली-रादोवान कहती हैं कि मेडिकल सुविधा की गुणवत्ता, डॉक्टर के अपाइंटमेंट और इलाज के लिए त्वचा का रंग और सरनेम कभी भी निर्णायक नहीं हो सकता. "डॉक्टरों और नर्सों को खास एंटी-रेसिज्म ट्रेनिंग की जरूरत है."

लैंगिक और उम्र से जुड़ा भेदभाव

रिपोर्ट में गोरे लोगों ने कहा कि उन्होंने भी भेदभाव का सामना किया है. महिलाओं का कहना है कि उन्होंने सेक्सिज्म का सामना किया जबकि पुरषों ने कहा कि उन्हें उम्र के आधार पर भेदभाव सहना पड़ा. इस रिपोर्ट के बाद भी और रिपोर्टें आनी हैं.

डीडब्ल्यू को पता चला है कि इस्राएल-हमास संघर्ष को देखते हुए, अगली रिपोर्ट में यहूदी विरोध की स्थिति पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा. जर्मन सेंटर फॉर इंटीग्रेशन एंड माइग्रेशन रिसर्च से खास तौर पर स्टडी करने के लिए कहा गया है.

परिवार मंत्री लीसा पाउस ने डीडब्ल्यू के एक सवाल के जवाब में कहा, "योजनाबद्ध और कारगर तरीके से कदम उठाने के लिए हमें और ज्यादा वैज्ञानिक जानकारियों और नियमित तौर पर डाटा की जरूरत है."

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