देश की खबरें | शामली से दिल्ली की सीमा तक, टिकैत की विरासत को प्ररेणा देती है ‘अखंड ज्योति’ और उनका हुक्का

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(यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पर हमारी श्रृंखला का हिस्सा है... तस्वीरों के साथ)

सिसौली (उप्र) 11 मार्च पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आज से करीब 34 साल पहले अप्रैल 1987 में बिजली की दरों में बढ़ोतरी के प्रस्ताव के खिलाफ महेन्द्र सिंह टिकैत ने किसानों से प्रदर्शन करने का आह्वान किया था, तभी उनके घर पर शगुन के तौर पर एक ‘दिया’ जलाया गया था, जो आज भी जल रहा है और आज भी नियमित रूप से शाम को एक हुक्का भी जलाया जाता है।

उस आंदोलन की बात करें तो, देखते ही देखते शामली में बिजली घर के बाहर तीन लाख से अधिक किसान एकत्रित हो गए और इस आंदोलन ने ही महेन्द्र को क्षेत्र में किसानों के सबसे बड़े नेता ‘‘बाबा टिकैत’’ के तौर पर पहचान दी।

इसके बाद टिकैत ने किसानों के साथ कई बड़े प्रदर्शनों में हिस्सा लिया और इस दौरान उनके परिवार वाले यह सुनिश्चित करते रहे की घर पर वह ‘दिया’ जलता रहे।

इन प्रदर्शनों में 1988 में राष्ट्रीय राजधानी में ‘बोट क्लब’ पर किया प्रदर्शन शामिल है, जिसके दौरान मध्य दिल्ली के अधिकतर इलाकों में पांच लाख से अधिक किसानों ने घेराबंदी की थी और जाट नेता ने बड़ी संख्या में अपने समर्थकों के साथ सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था।

अब टिकैत के निधन को एक दशक बीत गया है, लेकिन उनकी विरासत अब भी जिंदा है और वह ‘अखंड ज्योति’ अब भी जल रही है। साथ ही उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाला हुक्का भी जलाया जाता है।

दिल्ली से 100 किलोमीटर दूर सिसौली में दो मंजिला घर के भूतल पर उनके कमरे की परिवार वाले तथा उनके साथ काम करने वाले करीबी समर्थक रोज सफाई करते हैं। उनके कमरे में उनकी तस्वीर के सामने ही ‘अखंड ज्योति’ रखी गई है और रोजाना उसमें करीब 1.25 किलोग्राम घी डाला जाता है।

करीब 10X12 फुट के इस कमरे में एक पलंग और उस पर एक तकिया, बेंत की बनी एक कुर्सी, एक हुक्का, एक प्लास्टिक की कुर्सी, एक बिजली से चलने वाला हीटर और एक कोने में घी के कई कनस्तर रखे हैं।

टिकैत के चार बेटे में से सबसे छोटे नरेन्द्र टिकैत ने ‘पीटीआई-’ से कहा, ‘‘ पलंग की चादर, तकिए के खोल नियमिम रूप से बदले जाते हैं और हुक्का हर शाम जलाया जाता है। हम में से एक पूरे दिन की घटनाएं वहां जाकर बताता है।’’

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