देश की खबरें | पूर्व मंत्री अरुण शौरी ने चुनावों में धन, ‘प्रोपगैंडा’ की भूमिका को लेकर चिंता जताई

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नयी दिल्ली, 12 फरवरी चुनावों में धन एवं ‘प्रोपगैंडा’ की भूमिका को लेकर चिंता जाहिर करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने रविवार को कहा कि देश में राजनीति ‘‘खतरनाक चरण’’ में है।

‘टाइम्स लिट फेस्ट’ के समापन वाले दिन शौरी ने अपने संबोधन में कहा कि ‘‘विरोध के स्वर’’ को जगह नहीं दी जा रही है। शौरी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री थे।

उन्होंने कहा, ‘‘राजनीति न सिर्फ दूषित हो गई है, बल्कि यह एक खतरनाक चरण में पहुंच गई है, अधिकांश राजनीति वैसी ही है, जैसे कि उत्तर कोरिया में होती है। चुनाव क्या है? चुनाव का मतलब क्या है? प्रोपगैंडा की भूमिका क्या है, जिसका मीडिया हिस्सा है? क्या मुक्त एवं निष्पक्ष चुनाव होते हैं?’’

पत्रकार बरखा दत्त के साथ ‘‘डार्क टेल्स फ्रॉम पॉलिटिक्स एंड ब्यूरोक्रेसी’’ शीर्षक से एक सत्र में उन्होंने कहा, ‘‘आप देखिए किस तरह से वे विधायकों को खरीदते हैं, यह वो राजनीति नहीं है, जिसके आधार पर देश को बरकरार रखा जा सकता है।’’

जब कार्यक्रम के संचालक ने उनसे पूछा कि जो वह कह रहे हैं, अगर वह सही है, आखिर भाजपा चुनाव क्यों हारेगी, जैसा कि उन्होंने हाल के दिनों में अलग-अलग राज्यों में किया है, इस पर शौरी ने जवाब दिया, ‘‘क्योंकि उन्होंने सभी चीजों को ठीक नहीं किया है।’’

‘‘विरोध के स्वर’’ को नहीं सुना जाना वर्तमान शासन की मौजूदा राजनीति से 81 वर्षीय शौरी के नाखुश होने के कारणों में से एक है।

उन्होंने कहा, ‘‘...आज वास्तव में कौन खड़ा है। एक नेता जो जटिल और ऐसे खराब माहौल में भारत जैसे विशाल देश को चलाने की कोशिश कर रहा है, उसे ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो यह कहे कि ‘नहीं ऐसे नहीं ऐसे’ - और वह नेता जो कभी भी अपनी सलाह को तवज्जो नहीं दे, लेकिन निश्चित रूप से हर किसी की बात को सुने। वाजपेयी (पूर्व प्रधानमंत्री) के बारे में यह सबसे अच्छी बात थी।’’

शौरी ने कहा, ‘‘यह उन विशेषताओं में से एक है, जिसमें यह सरकार और भाजपा उस समय की चीजों से भिन्न हैं।’’

जाने-माने पत्रकार अक्सर पत्रकारों की स्थिति और भारत में कारोबार को लेकर अफ्रीकी मुहावरे ‘‘जिस कुत्ते के मुंह में हड्डी हो वह भौंक नहीं सकता’’ का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने कहा कि यह ‘‘वास्तव में पत्रकारिता का अंत है’’।

उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए पत्रकार और कारोबारी कुछ ही इसी तरह के व्यक्ति बन गए हैं, जिनके मुंह में हड्डी है। हो सकता है कि हमें कुछ मिल जाए, तो ऐसे व्यक्ति को परेशान क्यों करें। यह वाकई में पत्रकारिता का अंत है।’’

शौरी ने अडाणी समूह पर भारतीय मीडिया की रिपोर्टिंग को लेकर भी नाखुशी जताई।

गौतम अडाणी के नेतृत्व में पोर्ट-टू-पावर समूह 24 जनवरी को संकट में पड़ गया, जब हिंडनबर्ग की शोध में कंपनी पर धोखाधड़ी वाले लेनदेन और शेयर-कीमत में हेरफेर सहित कई आरोप लगाए गए।

शौरी ने कहा कि उनकी कंपनी पर ‘‘97 प्रतिशत’’ पकड़ उनके और उनके करीबी परिवार के सदस्यों या विशाल ‘‘300 प्रतिशत मूल्य कमाई (पीई) अनुपात’’ जैसी चीजों से सभी को सतर्क होना चाहिए था।

उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा 2019 से यह मुद्दा उठा रही हैं और कहा, ‘‘इनमें से किसी भी चीज के लिए किसी गहरी जानकारी की जरूरत नहीं है... ये ऐसे तथ्य हैं जिन्हें हर वित्तीय पत्रकार जानता है और बहुत कम लोग इसके बारे में लिखते हैं।’’

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