गिरते पड़ते दक्षिण अफ्रीका से भागते विदेशी

10 साल से भी ज्यादा समय तक त्वाइबु ने डरबन शहर में दर्जी का काम किया.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

10 साल से भी ज्यादा समय तक त्वाइबु ने डरबन शहर में दर्जी का काम किया. लेकिन जब वह जान बचाने के लिए वापस अपने देश मलावी भागे तो उनके पास भूख और गरीबी के अलावा कुछ नहीं था. हजारों लोगों के अनुभव इसी से मिलते जुलते हैं.दक्षिण अफ्रीका से भागकर मलावी पहुंचने वालों 32 साल की हवा त्रोको भी हैं. वापसी के दौरान वह पांच दिन तक एक कामचलाऊ कैंप में रहीं, तब जाकर उन्हें सरकारी बस में एक सीट मिली. मध्य मलावी के शहर, सलीमा में बस से उतरते वक्त त्रोको के पास सिर्फ एक ही चीज थी, पीठ पर बंधा 8 महीने का बच्चा. त्रोको कहती हैं, "मैंने सुना कि कुछ लोगों पर हमले हुए हैं, उनकी संपत्ति लूट ली गई है और कुछ को तो हत्या भी की गई."

अफ्रीकी विदेशियों को 30 जून तक दक्षिण अफ्रीका से निकल जाने की धमकी देने के कारण हजारों लोग अपने अपने वतन लौट चुके हैं. अधिकारियों के मुताबिक, अब तक 15,000 से ज्यादा मलावी के नागरिक, दक्षिण अफ्रीका छोड़ चुके हैं. घाना, नाइजीरिया और जिम्बाब्वे के हजारों लोग भी वापस लौट चुके हैं.

वयस्क होते ही मलावी से दक्षिण अफ्रीका जाने वाले हजारों नौजवानों में त्वाइबु हुसैन भी थे. दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर में उन्होंने दर्जी और कारपेंटर का काम किया. अब वह 31 साल की उम्र में खाली हाथ और टूटे मनोबल के साथ मलावी लौटे हैं. वह कहते हैं कि इस साल अचानक लोगों का मूड बदल गया.

समाचार एजेंसी एएफपी से बातचीत में त्वाइबु हुसैन ने कहा, "विदेशियों के प्रति घृणा बहुत ही बड़ी चुनौती बन चुकी है. यहां तक कि पुलिस अधिकारी भी हमारी वर्कशॉपों में आने लगे और लोगों को अपने साथ कैंपों में ले जाने लगे. दिख रहा था कि वहां विदेशियों को कोई नहीं चाहता था."

हुसैन दक्षिण अफ्रीका छोड़ने के लिए जब डरबन के अस्थायी कैंप में पहुंचे तो वहां 10 हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ पहले से मौजूद थी. बस टिकट मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं लग रहा था, "हम भूखे ही चल दिए, बिना नहाए ही रहे. कुछ लोग तो गश खाकर गिर पड़े."

अब कभी दक्षिण अफ्रीका नहीं जाएंगे

मलावी के दुर्गम गांव से निकलकर दक्षिण अफ्रीका गए अहमदी असानी भी बड़ी मुश्किल से जान बचाकर घर लौट सके. एनाम्बा गांव में उनका घर मिट्टी की ईंटों से बना है. फर्श उबड़ खाबड़ है और दीवारें खराब हो चुकी हैं. असानी को लगता था कि एक दिन थोड़ा पैसा जमा कर वह दक्षिण अफ्रीका से अपने गांव लौटेंगे और घर दुरुस्त करेंगे. लेकिन अब वह कंगाल हैं और कहते हैं कि जान बची यही बड़ी बात है, "वहां हम अपने डेरों में छुपे थे क्योंकि जान की चिंता थी."

दक्षिण अफ्रीका के पीटरमारित्जबुर्ग में कुछ लोगों की भीड़ अहमदी असानी के मुहल्ले में घुस गई. भीड़ ने दरवाजे तोड़कर विदेशियों को बाहर निकाला और मारपीट शुरू कर दी. किसी तरह भाग निकले असानी के मुताबिक, दो मलावियों की मौत हुई और दो घायल हुए.

असानी समेत मलावी वापस लौटे हजारों लोग अब कभी दक्षिण अफ्रीका वापस न जाने की कसमें खा रहे हैं. वैध वर्क परमिट के साथ नौ साल तक दक्षिण अफ्रीका में काम करने वाले जिम्बाब्वे के ताकेसुरे एयावो भी अपने देश लौट कर यही कह रहे हैं.

13 जून को कवाजुलु नटाल प्रांत में युवाओं का एक ग्रुप उनके घर पहुंचा और उन्हें दक्षिण अफ्रीका छोड़ने की धमकी देने लगा. बढ़ई का काम करने वाले एयावो कहते हैं, "उन्होंने मेरी संपत्ति लूटनी शुरू कर दी. वे फ्रिज, टीवी और मेरे औजार भी ले गए. बाद में वे बिस्तर ले जाने के लिए फिर आए, तब मैंने दरवाजा लॉक कर दिया क्योंकि उनके हाथ में बड़े बड़े चाकू थे."

अगले दिन अपनी पत्नी, तीन बच्चों और कुछ झोलों के साथ एयावो दक्षिण अफ्रीका छोड़ने की राह पर निकल पड़े.

दक्षिण अफ्रीका के प्रशासन का रुख

दक्षिण अफ्रीका की पुलिस का दावा है कि विदेशियों के खिलाफ हो रहे ज्यादातर प्रदर्शन शांतिपूर्ण हैं. बुधवार को पुलिस ने करीब 900 लोगों को गिरफ्तार करने का दावा किया. पुलिस का कहना है कि अरेस्ट किए गए लोगों में ज्यादातर विदेशी और स्थानीय सेंधमार हैं. पुलिस ने अब तक हुई हिंसा में मलावी के सिर्फ एक नागरिक की मौत की पुष्टि की है.

दक्षिण अफ्रीका में पांच साल पहले भी विदेशियों के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन हुए थे. तब करीब 350 लोग मारे गए थे.

दक्षिण अफ्रीका में चार नवंबर को स्थानीय निकायों के चुनाव हैं. देश की अर्थव्यवस्था बीते 15 साल से खस्ताहाल है. राजनीतिक दल, भारी असमानता, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और जनसुविधाओं में भीड़ के लिए विदेशियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.

दक्षिण अफ्रीका के हवाले नहीं होंगे गुप्ता बंधु

वर्ल्ड बैंक के मुताबिक दक्षिण अफ्रीका में बेरोजगारी की दर करीब 32.7 फीसदी है, लेकिन युवाओं में यह 43 फीसदी से ज्यादा है. यानी देश में 100 में से 43 युवा बेरोजगार हैं. देश पर जीडीपी का 75 फीसदी कर्ज चढ़ा है. हर साल सरकारी राजस्व का 20 फीसदी हिस्सा इस कर्ज का ब्याज चुकाने में जा रहा है.

वैध वर्क परमिट के साथ दक्षिण अफ्रीका में नौ साल बिता चुके एयावो कहते हैं, "जब हम सब दक्षिण अफ्रीका छोड़ देंगे, तब उन्हें दिखेगा कि समस्या, हमारी वजह से नहीं है."

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