ताजा खबरें | विकसित देश वैश्विक कार्बन बजट का अधिकांश हिस्सा उपभोग कर रहें: सरकार

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नयी दिल्ली, 10 अगस्त सरकार ने बृहस्पतिवार को कहा कि विकसित देशों ने वैश्विक कार्बन बजट का 80 प्रतिशत से अधिक उपभोग किया है, जिससे भारत जैसे देशों के पास भविष्य के लिए बहुत कम कार्बन स्पेस बचा है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सदस्य सी एम रमेश के एक सवाल का जवाब देते हुए पर्यावरण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने राज्यसभा को बताया कि भारत जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपने उचित हिस्से से कहीं अधिक कर रहा है।

मंत्री ने कहा कि विकसित देशों ने 2,100 तक औसत तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए वैश्विक कार्बन बजट (1850 से) का 80 प्रतिशत से अधिक उपभोग किया है, जिससे भारत जैसे देशों के पास ‘भविष्य के लिए बहुत कम कार्बन स्पेस’ बचा है।

उन्होंने कहा कि अमीर देश भारत के लिए ‘इस कम अधिकार को भी खा रहे हैं’।

उन्होंने कहा कि इसके बावजूद भारत ने अपने लोगों, अर्थव्यवस्था और समाज की जरूरतों और आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए पूरे विश्व के लिए सतत विकास मार्ग का नेतृत्व करने की आवश्यकता के प्रति सचेत रहते हुए अपनी जलवायु वार्ता पर चलने का विकल्प चुना है।

जलवायु विज्ञान कार्बन बजट को ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा के रूप में परिभाषित करता है जो ग्लोबल वार्मिंग के एक निश्चित स्तर (इस मामले में 1.5 डिग्री सेल्सियस) के लिए उत्सर्जित हो सकते हैं।

भारत का वार्षिक उत्सर्जन तीन प्रमुख उत्सर्जकों - चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ से काफी नीचे है और इसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विश्व औसत से बहुत कम है।

चौबे ने उच्च सदन को बताया कि 1850 से 2019 तक वैश्विक संचयी उत्सर्जन में देश का हिस्सा 4 प्रतिशत से भी कम है।

मंत्री ने कहा कि भारत के जलवायु संबंधी कदमों का वित्तपोषण अब तक बड़े पैमाने पर घरेलू संसाधनों के माध्यम से किया गया है।

उन्होंने कहा कि 2015 में पेरिस जलवायु वार्ता में, देशों ने जलवायु परिवर्तन के चरम, विनाशकारी और संभावित अपरिवर्तनीय प्रभावों से बचने के लिए पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने पर सहमति व्यक्त की।

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