देश की खबरें | दिल्ली दंगे: खालिद सैफी ने मुकदमे की सुनवाई में देरी के आधार पर जमानत मांगी

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नयी दिल्ली, चार मार्च दिल्ली दंगों के आरोपी और ‘यूनाइटेड अगेंस्ट हेट’ के संस्थापक खालिद सैफी ने मंगलवार को दिल्ली उच्च न्यायालय में दलील दी कि एक संवैधानिक अदालत गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के आरोपों के बावजूद मुकदमे की सुनवाई में देरी के आधार पर उन्हें जमानत दे सकती है।

न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति शालिंदर कौर की पीठ के समक्ष सैफी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने इसी मामले में जमानत पर बाहर आए सह-आरोपियों के साथ समानता का अनुरोध किया और कहा कि शीघ्र सुनवाई संवैधानिक रूप से संरक्षित अधिकार है, जिस पर विचार किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘विलंब एक ऐसा तथ्य है, जिस पर संवैधानिक न्यायालय द्वारा विचार किया जा सकता है, भले ही जमानत पर रोक लगाने वाले प्रावधान मौजूद हों। जब आपके पास ऐसा कठोर प्रावधान हो, तो यह देखना न्यायालय का कर्तव्य है कि क्या किसी अनुचित कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आतंकवादी कृत्य के समान है।’’

जॉन ने अपने मुवक्किल की ओर से कहा, ‘‘मुझे 15 जून, 2021 के प्रारंभ में जमानत पर रिहा किए गए व्यक्तियों के साथ समानता का दावा करने का पूरा अधिकार है। हम लगभग चार साल बाद आये हैं। मैं 21 मार्च, 2020 से हिरासत में हूं।’’

जॉन के मुताबिक, सैफी खुरेजी खास में विरोध प्रदर्शन के आयोजक थे और यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा था। उन्होंने कहा कि सैफी के पास से कोई हथियार या पैसा या कोई अन्य अभियोजन योग्य सामग्री नहीं मिली थी।

जॉन ने कहा कि सैफी द्वारा दिए गए तीनों भाषण हानिरहित थे तथा उनमें कोई भड़काऊ बात नहीं थी।

उन्होंने सैफी के ‘हानिरहित संदेशों’ पर यूएपीए के आरोप लगाने पर सवाल उठाया, जो अंततः उन्हें जमानत देने से इनकार करने का आधार बन गया।

इससे पहले, दिल्ली पुलिस ने तर्क दिया था कि त्वरित सुनवाई का अधिकार कोई मुफ्त पास नहीं है और वर्तमान मामले में, समाज के अधिकार को व्यक्ति के अधिकार पर प्रभावी होना चाहिए।

उसने दावा किया कि आरोपी व्यक्तियों ने ‘चक्का जाम’ की बात करते हुए भड़काऊ भाषण दिए और विरोध प्रदर्शन स्वाभाविक नहीं थे।

उमर खालिद, शरजील इमाम, सैफी और कई अन्य लोगों पर फरवरी 2020 के दंगों के कथित तौर पर ‘षड्यंत्रकर्ता’ होने को लेकर आतंकवाद विरोधी कानून गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और भादंसं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

इन दंगों में 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक घायल हुए थे।

सीएए और एनआरसी के विरूद्ध प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई थी।

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