देश की खबरें | दिल्ली के उपराज्यपाल ने डिस्कॉम बोर्ड से आप सरकार के नामित व्यक्तियों को हटाया

नयी दिल्ली, 11 फरवरी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली सरकार द्वारा राष्ट्रीय राजधानी में बिजली वितरण कंपनियों के बोर्ड में नामित आम आदमी पार्टी (आप) के नेता जैस्मीन शाह सहित अन्य व्यक्तियों की जगह वरिष्ठ अधिकारियों को नियुक्त किया गया है। उपराज्यपाल वी के सक्सेना के निर्देश पर यह कार्रवाई की गयी है। उपराज्यपाल कार्यालय के सूत्रों ने शनिवार को यह जानकारी दी।

इस कार्रवाई को लेकर राजनिवास और ‘आप’ सरकार के बीच ताजा गतिरोध पैदा हो गया है। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने केजरीवाल सरकार द्वारा नियुक्त सदस्यों को ‘डिस्कॉम’ बोर्ड से हटाने के उपराज्यपाल वी के सक्सेना के फैसले को शनिवार को ‘‘असंवैधानिक और अवैध’’ करार दिया।

सिसोदिया ने यह भी आरोप लगाया कि उपराज्यपाल संविधान और उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन नहीं कर रहे, जिसमें कहा गया है कि स्वतंत्र निर्णय लेने की उनकी शक्ति तीन विषयों- पुलिस, भूमि और सेवाओं तक सीमित है।

सूत्रों ने दावा किया कि ‘आप’ के प्रवक्ता शाह के अलावा जिन लोगों को बोर्ड से हटाया गया है उनमें आप सांसद एन डी गुप्ता के पुत्र नवीन गुप्ता और ‘सरकार द्वारा नामित व्यक्ति’ के तौर पर ‘‘अवैध रूप से’’ नियुक्त किए गए अन्य लोग शामिल हैं।

दिल्ली सरकार के बिजली विभाग ने उपराज्यपाल सक्सेना के निर्देश के बाद शुक्रवार को चार नामितों को हटाने का आदेश जारी किया।

सरकार के नामितों को हटाने के लिए उपराज्यपाल का निर्देश एक अंतरिम उपाय के रूप में आया है, क्योंकि उनके द्वारा इस मुद्दे को राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए भेजा गया था, जो अब भी लंबित है।

उपराज्यपाल कार्यालय के सूत्रों ने बताया कि बोर्ड में आप नेता जस्मीन शाह समेत ‘सरकारी मनोनीतों’ की जगह वरिष्ठ अधिकारियों को लाया गया है।

उन्होंने कहा कि आप प्रवक्ता शाह समेत बोर्ड से जिन लोगों को हटाया गया है उनमें आप सांसद एन डी गुप्ता के बेटे और अन्य निजी व्यक्ति शामिल हैं जो बोर्ड में ‘‘अवैध रूप से मनोनीत’’ थे। उन्होंने कहा कि अब वित्त सचिव, विद्युत सचिव और दिल्ली ट्रांस्को के प्रबंध निदेशक बीवाईपीएल, बीआरपीएफ और टीपीडीडीएल के बोर्ड में सरकार का प्रतिनिधित्व करेंगे।

सत्तारूढ़ ‘आप’ ने डिस्कॉम के बोर्ड से शाह और गुप्ता को हटाने के उपराज्यपाल के आदेश को ‘‘अवैध और असंवैधानिक’’ करार दिया है। उसका दावा है कि उपराज्यपाल के पास इस तरह के आदेश जारी करने का अधिकार नहीं है।

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