नयी दिल्ली, छह जनवरी उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र सरकार से पूछा कि क्या देश में 32 लाख से अधिक गैर- सरकारी संगठनों (एनजीओ) और स्वयंसेवी संगठनों को सार्वजनिक धन के वितरण के विनियमन के लिए एक "व्यापक" योजना बनाने का उसका कोई इरादा है।
प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज से इस बाबत सरकार से निर्देश लेने और न्यायालय को अवगत कराने को कहा।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने पूछा, ‘‘क्या इस पर कोई विनियमन तंत्र है?"
पीठ ने कहा, "आप (केंद्र) विनिनयम के लिए व्यापक विधायी या प्रशासनिक योजना के साथ आएं।" पीठ ने विधि अधिकारी को इस बारे में सरकार के रुख से उसे अवगत कराने को कहा।
शीर्ष अदालत ने पहले भी केंद्र से गैर-सरकारी संगठनों और स्वैच्छिक संगठनों को सार्वजनिक धन के वितरण को विनियमित करने के लिए एक कानून बनाने पर विचार करने और दुरुपयोग या हेराफेरी के मामले में मुकदमा चलाने के लिए कहा था।
पीठ वकील एम. एल. शर्मा की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
सीबीआई ने सितंबर 2015 में शीर्ष अदालत को बताया था कि देश भर में कार्यरत 30 लाख से अधिक एनजीओ में से 10 प्रतिशत से भी कम ने अपने रिटर्न या बैलेंस शीट और अन्य वित्तीय विवरण अधिकारियों को सौंपे हैं।
जनहित याचिका में गैर-सरकारी संगठनों द्वारा धन के कथित गबन की जांच की मांग की गई है।
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