देश की खबरें | न्यायालय ने पूछा: क्या विधायिका को धर्म, लिंग-तटस्थ कानून बनाने का निर्देश दे सकते हैं

नयी दिल्ली, छह जनवरी उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को एक याचिकाकर्ता से यह सवाल किया कि क्या वह (न्यायालय) विधायिका को विवाह योग्य उम्र, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार, विरासत और गुजारा भत्ता जैसे विषयों पर धर्म और लिंग-तटस्थ कानून बनाने का निर्देश दे सकता है।

प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला की पीठ विभिन्न मुद्दों पर एक समान धर्म और लिंग-तटस्थ कानून बनाने के लिए सरकार को निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

वकील अश्विनी उपाध्याय ने यह याचिका दायर की है।

पीठ ने कहा, "यह विधायिका के अधिकारक्षेत्र में आता है। श्री उपाध्याय, कृपया इसका जवाब दें कि यह विधायी हस्तक्षेप से संबंधित है और इस पर कानून बनाना संसद का काम है। इसे एक प्रारंभिक मुद्दे के रूप में लें और हमें इसका जवाब दें।"

याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने तलाक, गोद लेने, अभिरक्षा, उत्तराधिकार, विरासत, रखरखाव, विवाह की आयु और गुजारा भत्ता के लिए धर्म और लिंग-तटस्थ समान कानून बनाने का केंद्र को निर्देश देने को लेकर पांच अलग-अलग याचिकाएं दायर की हैं।

उपाध्याय ने अगस्त 2020 में संविधान और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की भावना को ध्यान में रखते हुए सभी नागरिकों के लिए "तलाक के एक समान आधार" की मांग करते हुए एक जनहित याचिका दायर की है।

उन्होंने अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे के माध्यम से एक और जनहित याचिका दायर की जिसमें संविधान और अंतरराष्ट्रीय संधियों की भावना के अनुरूप सभी नागरिकों के लिए "लिंग और धर्म-तटस्थ" भरण-पोषण और गुजारा भत्ता को लेकर समान आधार की मांग की गई थी।

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