देश की खबरें | दूसरा धर्म अपनाने वालों को अजा का दर्जा देने पर विचार के लिए केंद्र ने बनाया आयोग

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. केंद्र ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश के जी बालकृष्णन की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया है जो उन लोगों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के मामले का गहन विश्लेषण करेगा, जिनका “ऐतिहासिक रूप से” अनुसूचित जाति से संबंध है, लेकिन जिन्होंने राष्ट्रपति के आदेशों में उल्लिखित धर्मों के अलावा किसी अन्य धर्म को अपना लिया है।

नयी दिल्ली, सात अक्टूबर केंद्र ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश के जी बालकृष्णन की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया है जो उन लोगों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के मामले का गहन विश्लेषण करेगा, जिनका “ऐतिहासिक रूप से” अनुसूचित जाति से संबंध है, लेकिन जिन्होंने राष्ट्रपति के आदेशों में उल्लिखित धर्मों के अलावा किसी अन्य धर्म को अपना लिया है।

संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 (समय-समय पर संशोधित) कहता है कि हिंदू या सिख धर्म या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता है।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा बृहस्पतिवार को जारी गजट अधिसूचना के अनुसार, तीन सदस्यीय आयोग में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी डॉ. रविंदर कुमार जैन और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की सदस्य प्रोफेसर सुषमा यादव भी शामिल हैं।

आयोग नए व्यक्तियों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के मामले की जांच करेगा, जो ऐतिहासिक रूप से अनुसूचित जाति के होने का दावा करते हैं, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत समय-समय पर जारी राष्ट्रपति के आदेशों में उल्लिखित धर्मों के अलावा अन्य धर्म को अपना चुके हैं।

मौजूदा अनुसूचित जातियों पर निर्णय -अगर अमल में आता है तो- के निहितार्थों की भी आयोग जांच करेगा। इसके अलावा, इन लोगों के अन्य धर्मों में परिवर्तित होने के बाद, रीति-रिवाजों, परंपराओं और सामाजिक भेदभाव और अभाव की स्थिति में बदलाव पर भी ध्यान दिया जाएगा।

आयोग किसी भी अन्य संबंधित प्रश्नों पर भी मंथन कर सकता है जो वह केंद्र के परामर्श और उसकी सहमति से उचित समझे।

के जी बालकृष्णन उच्चतम न्यायालय के पहले दलित प्रधान न्यायाधीश थे। वह भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

अधिसूचना में, मंत्रालय ने कहा कि यह मुद्दा “मौलिक और ऐतिहासिक रूप से जटिल सामाजिक और संवैधानिक प्रश्न” है और निश्चित रूप से सार्वजनिक महत्व का एक मामला है।

अधिसूचना के अनुसार, “इसके महत्व, संवेदनशीलता और संभावित प्रभाव को देखते हुए, इस संबंध में परि में कोई भी बदलाव विस्तृत और निश्चित अध्ययन और सभी हितधारकों के साथ व्यापक परामर्श के आधार पर होना चाहिए और जांच आयोग अधिनियम, 1952 (1952 का 60) के तहत किसी आयोग ने अब तक इस मामले की जांच नहीं की है।”

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