देश की खबरें | अखिल भारतीय सम्मेलन में नयी जनजातीय नीति का आह्वान

विशाखापत्तनम, 21 मई आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में रविवार को आयोजित एक दिवसीय अखिल भारतीय जनजातीय सम्मेलन में आदिवासी इतिहास अकादमी की स्थापना, आदिवासी ओं, संस्कृतियों का विकास सुनिश्चित करने के लिए एक नयी जनजातीय नीति का आह्वान किया गया।

झारखंड की प्रसिद्ध आदिवासी लेखक और कार्यकर्ता वासवी किड़ो ने सम्मेलन का उद्घाटन किया। सम्मेलन में आदिवासी चिकित्सा, व्यंजनों और अन्य ज्ञान पर प्रकाश डाला गया। ‘सोनोट जुआर’ (प्रकृति कायम रहे), ऊटे आबुवा (यह जमीन हमारी है), बीर आबुवा (जंगल हमारे हैं) और दिसुम आबुवा-देश (देश) हमारा है और ‘जय जोहार’ के नारे लगे।

एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, किड़ो ने जोर दिया कि आदिवासियों को अपने अधिकारों पर लड़ने के लिए खुद को संगठित करना चाहिए, यह देखते हुए कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नेतृत्व वाली ताकतें आदिवासियों को कथित तौर पर विभाजित कर रही हैं और उनके बीच दरार पैदा कर रही हैं।

किड़ो ने कहा कि दुनिया में 70 करोड़ से अधिक स्वदेशी लोग रहते हैं जिनमें से 20 करोड़ भारत में हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इन जनजातियों में से 7,000 आदिवासी संस्कृतियों की उपेक्षा की जा रही है और आजादी के 75 साल बाद भी उनका दमन हो रहा है।

किड़ो ने कहा, ‘‘भारत में आदिवासी सरकार की नीति के कारण पीड़ित हैं जो ‘विकास प्रेरित विस्थापन’, वनों और प्राकृतिक संपदा की लूट, भूमि हड़पने, प्रकृति का विनाश, सरना जैसे स्वदेशी धर्मों को पहचानने में विफलता, उन्हें जबरन हिंदू धर्म में आत्मसात करने का प्रयास और उनके संवैधानिक तथा कानूनी अधिकारों को लागू करने में नाकामी से प्रभावित हैं।’’

आदिवासियों की अन्य अत्यावश्यक जरूरतों पर जोर के अलावा, सम्मेलन ने चार प्रस्ताव भी पारित किए हैं। इनमें मध्य प्रदेश के बुरहानपुर, छत्तीसगढ़ और देश के अन्य हिस्सों में आदिवासियों के दमन की निंदा की गई। इसके अलावा प्रस्ताव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद बृजभूषण सिंह की गिरफ्तारी की मांग, मणिपुर में कथित आरएसएस प्रायोजित हिंसा और आंध्र प्रदेश के वाकापल्ली में अर्धसैनिक बलों द्वारा आदिवासी महिला के सामूहिक बलात्कार की निंदा की गई।

सम्मेलन में 11 राज्यों के 600 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया और 15 सदस्यीय फोरम समिति के गठन को भी मंजूरी दी।

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