देश की खबरें | सत्ताविरोधी लहर और मतदाताओं का मन बदल जाने के कारण बीआरएस को मुंह की खानी पड़ी

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. तेलंगाना में सत्ताविरोधी लहर, केसीआर परिवार से मतदाताओं का मोहभंग, युवाओं में उपजे असंतोष जैसे कारकों की वजह से प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) को मुंह की खानी पड़ी। मतगणना में प्राप्त रुझानों और परिणामों में बीआरएस बुरी तरह पिछड़ गयी है।

हैदराबाद, तीन दिसंबर तेलंगाना में सत्ताविरोधी लहर, केसीआर परिवार से मतदाताओं का मोहभंग, युवाओं में उपजे असंतोष जैसे कारकों की वजह से प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) को मुंह की खानी पड़ी। मतगणना में प्राप्त रुझानों और परिणामों में बीआरएस बुरी तरह पिछड़ गयी है।

बीआरएस प्रमुख एवं मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की छवि, पार्टी के विस्तृत जमीनी नेटवर्क तथा कल्याणकारी कार्यक्रमों के बावजूद उसके नेताओं के आसानी से नहीं मिल पाने की धारणा ने सत्ताविरोधी भावनाओं को बढ़ाया।

उसपर भी तुर्रा यह रहा कि विपक्ष ने लोगों के सामने पेश किया कि राज्य में बीआरएस परिवार का शासन है। इस बात ने भी सत्ताविरोधी भावना को काफी बढ़ाया। इस चुनाव में अधिकतर मौजूदा विधायकों को फिर से उतारने का पार्टी भी फैसला भी उसे वांछित परिणाम नहीं दे पाया।

सन् 2014 में तेलंगाना के गठन के समय से बीआरएस का राज्य की राजनीति पर दबदबा रहा। उससे पहले भी 2001 से अविभाजित आंध्र प्रदेश में उसकी अच्छी खासी उपस्थिति थी।

वैसे तो बीआरएस सरकार कई कल्याणकारी योजनाएं लेकर आयी लेकिन गरीबों के लिए मकान, नौकरी के पर्याप्त अवसर सृजित करने, बेरोजगारी राहत देने, किसान ऋण माफी के क्रियान्वयन में देरी समेत अहम चुनाव वादों को पूरा करने में उसकी कथित विफलता तथा भर्ती परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने जैसी घटनाएं उसके खिलाफ चली गयीं।

प्रारंभ में भाजपा को बीआरएस के लिए बड़ी चुनौती समझा गया लेकिन मई में कर्नाटक चुनाव के बाद कांग्रेस आगे बढ़ गयी और परिदृश्य बदल गया। खासकर दिल्ली की आबकारी नीति मामले में बीआरएस और भाजपा के बीच गुचचुप समझौते के आरोपों ने भाजपा को कमजोर किया तथा सत्ताविरोधी वोट कांग्रेस के पक्ष में एकजुट हो गये। इस आबकारी नीति मामले में मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की बेटी कविता कथित रूप से शामिल हैं।

पिछले चुनावों के विपरीत इस बार भावनात्मक मुद्दों का चुनाव में खास असर नजर नहीं आया। पिछले चुनावों में पृथक राज्य गठन की भावना ने अहम भूमिका निभायी थी।

सन् 2018 के चुनाव में कांग्रेस और तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) ने गठजोड़ किया था तथा बीआरएस ने तेदेपा प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू पर तेलंगाना विरोधी होने का आरोप लगाया था। लेकिन इस बार, आंध्र प्रदेश में चल रहे कानूनी मामलों और नायडू के जेल में रहने के कारण तेदेपा ने तेलंगाना में विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया।

इसी तरह, अविभाजित आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे वाई एस राजशेखर रेड्डी की बेटी वाई एस शर्मिला की अगुवाई वाली वाईएसआर तेलंगाना पार्टी भी तेलंगाना के चुनावी मुकाबले से हट गयी और उसने कांग्रेस के प्रति समर्थन की घोषणा की।

कांग्रेस ने भी एक जबर्दस्त अभियान चलाया जो बदलाव पर केंद्रित था। इस अभियान में ‘मारपू कवली - कांग्रेस रवली (बदलाव होना चाहिए, कांग्रेस को आना चाहिए) मुख्य नारा था और मतदाताओं को यह बड़ा रास आया।

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)

Share Now

\