देश की खबरें | बिहार जातिगत गणना: पटना उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई अब तीन अक्टूबर को

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने बिहार में जातिगत गणना जारी रखने संबंधी पटना उच्च न्यायालय के एक अगस्त के आदेश को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई बुधवार को तीन अक्टूबर के लिए टाल दी।

नयी दिल्ली, छह सितंबर उच्चतम न्यायालय ने बिहार में जातिगत गणना जारी रखने संबंधी पटना उच्च न्यायालय के एक अगस्त के आदेश को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई बुधवार को तीन अक्टूबर के लिए टाल दी।

न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति एस वी एन भट्टी ने यह उल्लेख किया कि मामले में एक पक्षकार ने स्थगन के लिए अनुरोध किया है।

शीर्ष न्यायालय ने उच्च न्यायालय के संबद्ध आदेश के खिलाफ गैर सरकारी संगठन ‘एक सोच एक प्रयास’ द्वारा दायर याचिका अन्य याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध कर दी।

शीर्ष न्यायालय ने सात अगस्त को, बिहार में जातिगत गणना जारी रखने संबंधी पटना उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था, और इसे चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई 14 अगस्त के लिए टाल दी थी।

गैर सरकारी संगठन की याचिका के अलावा, एक अन्य याचिका नालंदा निवासी अखिलेश कुमार ने दायर की थी, जिन्होंने दलील दी कि जातिगत गणना के लिए राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना संवैधानिक प्रावधान के खिलाफ है।

कुमार की याचिका में कहा गया है संवैधानिक प्रावधान के तहत केवल केंद्र सरकार को जनगणना करने की शक्ति दी गई है।

कुमार ने याचिका में कहा है, ‘‘मौजूदा मामले में, बिहार राज्य ने गजट पत्र में अधिसूचना प्रकाशित कर भारत संघ की शक्तियों को हड़पने की कोशिश की।’’

अधिवक्ता बरूण कुमार सिन्हा के जरिये दायर याचिका के अनुसार, ‘‘यह दलील दी जाती है कि 6 जून, 2022 की अधिसूचना, संविधान की सातवीं अनुसूची के साथ पढ़े जाने पर अनुच्छेद 246 के तहत प्रदत्त राज्य और केंद्रीय विधानमंडल के बीच शक्तियों के बंटवारे के संवैधानिक प्रावधान के खिलाफ है और जनगणना नियम, 1990 के साथ पढ़े जाने पर जनगणना अधिनियम, 1948 के दायरे से बाहर है। इसलिए यह प्रारंभ से ही अमान्य है।’’

याचिका में दलील दी गई है कि बिहार सरकार द्वारा कराये जा रहे इस सर्वेक्षण की पूरी कवायद बगैर प्राधिकार और विधायी क्षमता के है, तथा दुर्भावना का संकेत देता है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अक्सर ही इस बात पर जोर दिया है कि राज्य जातिगत गणना नहीं कर रहा है, बल्कि यह लोगों की आर्थिक स्थिति और उनकी जाति के बारे में केवल सूचना एकत्र कर रहा है, ताकि उनकी बेहतर सेवा करने के लिए राज्य सरकार द्वारा कदम उठाया जा सके।

उच्च न्यायालय ने 101 पन्नों के अपने फैसले में कहा था, ‘‘हमने राज्य की कवायद को पूरी तरह से वैध पाया है, जो न्याय के साथ विकास करने के औचित्यपूर्ण लक्ष्य के साथ शुरू की गई है।’’

जातिगत गणना को उच्च न्यायालय के ‘‘वैध’’ करार देने के एक दिन बाद राज्य सरकार हरकत में आ गई और शिक्षकों के लिए जारी सभी प्रशिक्षण कार्यक्रम स्थगित कर दिये, ताकि उन्हें इस कवायद को शीघ्र पूरा करने के काम में लाया जा सके।

नीतीश ने 25 अगस्त को कहा था कि सर्वेक्षण पूरा हो गया है और आंकड़े जल्द ही सार्वजनिक किये जाएंगे।

वहीं, मामले में एक याचिकाकार्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन ने आंकड़े सार्वजनिक किये जाने का विरोध करते हुए दलील दी थी कि यह लोगों की निजता के अधिकार का हनन करेगा।

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