विदेश की खबरें | कृत्रिम कोख किसी दिन वास्तविकता बनकर पितृत्व के बारे में हमारी धारणाओं को बदल सकती है

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on world at LatestLY हिन्दी. लैंकेस्टर, चार दिसंबर (द कन्वरसेशन) हमारा प्रजनन जीवन हमारे पूर्वजों के मुकाबले काफी अलग है और इसके लिए पिछले कुछ दशकों में हुए स्वास्थ्य नवाचारों को कुछ हद तक श्रेय दिया जा सकता है। आईवीएफ, दानदाता से मिलने वाले अंडे और शुक्राणु, गर्भ प्रत्यारोपण, सरोगेसी और अंडा फ्रीजिंग जैसी प्रथाओं का मतलब है कि कई लोगों के लिए अब पहले से कहीं अधिक विकल्प हैं कि क्या, कब और कैसे बच्चा पैदा करना है।

श्रीलंका के प्रधानमंत्री दिनेश गुणवर्धने

लैंकेस्टर, चार दिसंबर (द कन्वरसेशन) हमारा प्रजनन जीवन हमारे पूर्वजों के मुकाबले काफी अलग है और इसके लिए पिछले कुछ दशकों में हुए स्वास्थ्य नवाचारों को कुछ हद तक श्रेय दिया जा सकता है। आईवीएफ, दानदाता से मिलने वाले अंडे और शुक्राणु, गर्भ प्रत्यारोपण, सरोगेसी और अंडा फ्रीजिंग जैसी प्रथाओं का मतलब है कि कई लोगों के लिए अब पहले से कहीं अधिक विकल्प हैं कि क्या, कब और कैसे बच्चा पैदा करना है।

फिर भी, इन प्रगतियों के बावजूद, प्रजनन का एक पहलू स्थिर बना हुआ है और वह है गर्भ में भ्रूण को विकसित करने की आवश्यकता। लेकिन अगर प्रौद्योगिकी ने मानव शरीर के बाहर भ्रूण को विकसित करना संभव बना दिया तो पितृत्व के बारे में हमारी धारणाओं का क्या होगा? हाल तक, एक्टोजेनेसिस - शरीर के बाहर भ्रूण का विकास - का विचार विज्ञान कथा रहा है। लेकिन अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान की टीमों ने कृत्रिम गर्भ विकसित करना शुरू कर दिया है। आशा है कि यह तकनीक किसी दिन समय से पहले जन्म लेने वाले शिशुओं की जान बचाने के काम आएगी।

जानवरों पर परीक्षण पहले ही किए जा चुके हैं - शोधकर्ताओं ने मेमने के भ्रूण को कोख से बाहर विकसित करने में सफलता की सूचना दी है।

इस बीच, नीदरलैंड में एक टीम सिमुलेशन तकनीक का उपयोग करके एक समान प्रणाली विकसित कर रही है। यह दृष्टिकोण उन्नत निगरानी और कंप्यूटर मॉडलिंग से सुसज्जित मैनिकिन का उपयोग करके समय से काफी पहले जन्मे शिशुओं को जन्म के समय तक ले जाने की प्रक्रिया की नकल करता है। इससे शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद मिलती है कि एक शिशु ऐसे वातावरण में कैसे विकसित हो सकता है जो गर्भ की स्थितियों का अनुकरण करता है।

हालाँकि इसमें कई दशक लग सकते हैं, और यह वर्तमान शोध का इच्छित समापन बिंदु नहीं है, कृत्रिम गर्भ प्रौद्योगिकियाँ अंततः ‘‘पूर्ण एक्टोजेनेसिस’’ का रास्ता बना सकती हैं, जिसका मतलब होगा गर्भाधान से लेकर ‘‘जन्म’’ तक भ्रूण को मानव शरीर के बाहर पूरी तरह से विकसित करना।

पूर्ण एक्टोजेनेसिस में अनुसंधान में एक बाधा दुनिया भर में मौजूदा कानून है, जो या तो भ्रूण अनुसंधान पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाता है या 14 दिनों से अधिक समय तक अनुसंधान के लिए मानव भ्रूण को विकसित करने पर रोक लगाता है।

इसलिए इस प्रकार के शोध के लिए कानून में बदलाव की आवश्यकता होगी। अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय के बीच इसके प्रति जिज्ञासा बढ़ रही है, लेकिन इस तरह के बदलाव को जनता का समर्थन मिलेगा या नहीं यह ज्ञात नहीं है।

पूर्ण एक्टोजेनेसिस महत्वपूर्ण नैतिक, कानूनी और सामाजिक प्रश्न भी उठाता है, जिनका उपयोग करने से पहले उत्तर देना आवश्यक होगा।

यूके में, जो बच्चे को जन्म दे वही बच्चे की कानूनी मां होती है - आनुवंशिकी या इरादे की परवाह किए बिना। हालाँकि, कृत्रिम गर्भ में भ्रूण का विकास गर्भधारण और मातृत्व के बीच के इस संबंध को तोड़ सकता है।

सरोगेसी ने, कुछ हद तक, मातृत्व की हमारी कानूनी और सामाजिक अवधारणाओं को पहले ही चुनौती दे दी है। जन्म के समय सरोगेट बच्चे की कानूनी मां होती है, लेकिन माता-पिता के आदेश या गोद लेने के माध्यम से बच्चे को इच्छित माता-पिता को हस्तांतरित किया जा सकता है।

लेकिन कृत्रिम गर्भ लंबे समय से स्थापित मानदंडों को और अधिक गहन तरीकों से बाधित कर सकता है, क्योंकि अब कोई ‘‘जन्म देने वाली मां’’ नहीं होगी। कानून को यह परिभाषित करने की आवश्यकता होगी कि ऐसी परिस्थितियों में कानूनी मां कौन है, और क्या यह परि सभी माताओं पर लागू होती है या केवल जब कृत्रिम गर्भ प्रौद्योगिकियों का उपयोग किया जाता है।

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