वायरस के चलते आर्कटिक अनुसंधान मिशन में देरी
कुछ समय के लिए लगने लगा था कि अंतरराष्ट्रीय मिशन को बंद करना पड़ेगा क्योंकि वायरस के चलते एक के बाद एक देशों में लॉकडाउन लागू होने लगा। पिछले साल से आर्कटिक के ऊंचाई वाले इलाके में मौजूद जर्मन अनुसंधान पोत पोलरस्टर्न तक नयी आपूर्तियों एवं चालक दल भेजे जाने की योजना पर पानी फिर गया।
उनके इस मिशन के अहम चरण में पहुंचने के साथ ही कोरोना वायरस संकट ने पूरे विश्व को घेर लिया और लॉकडाउन के चलते कई अनुसंधानकर्ता साल भर चलने वाले आर्कटिक अनुसंधान मिशन में फिर से शामिल होने का इंतजार करने के लिए मजबूर हैं। इस मिशन का लक्ष्य जलवायु परिवर्तन का अनुमान लगाने के लिए प्रयुक्त होने वाले प्रतिरूपों में सुधार करना है।
कुछ समय के लिए लगने लगा था कि अंतरराष्ट्रीय मिशन को बंद करना पड़ेगा क्योंकि वायरस के चलते एक के बाद एक देशों में लॉकडाउन लागू होने लगा। पिछले साल से आर्कटिक के ऊंचाई वाले इलाके में मौजूद जर्मन अनुसंधान पोत पोलरस्टर्न तक नयी आपूर्तियों एवं चालक दल भेजे जाने की योजना पर पानी फिर गया।
कोलराडो यूनिवर्सिटी के वातावरणीय वैज्ञानिक और मोजेक खोज अभियान के सह-अगुवा मैथ्यू शूपे ने कहा कि वैश्विक महामारी की खबर ने पोत पर मौजूद वैज्ञानिकों के बीच घबराहट पैदा कर दी।
उन्होंने जर्मनी के ब्रेमरहेवन बंदरगाह से एक वीडियो साक्षात्कार में कहा, “कुछ लोग अपने परिवारों के साथ बस घर पर रहना चाहते थे।’’
ध्रुवीय एवं महासागरीय अनुसंधान के लिए ऑल्फ्रेड वेगेनर के आयोजकों ने पिछले महीने कनाडा होते हुए कुछ लोगों को हवाई माध्यम से निकाला था। चालक दल के अन्य सदस्यों को दो अन्य जर्मन अनुसंधान पोतों की मदद से निकाला जाएगा।
वैज्ञानिकों को वहां से निकाले जाने से पोलरस्टर्न को आर्कटिक चक्र में इस अहम समय में कम से कम तीन हफ्तों के लिए अपनी मौजूदा स्थान से हटना पड़ेगा।
शूपे ने बताया कि यह महत्त्वपूर्ण समय है जब समुद्री बर्फ के पिघलने का मौसम शुरू होगा और यह पोत के वहां से हटने के बाद होगा।
कुछ महत्त्वपूर्ण डेटा को गायब होने से बचाने के लिए अनुसंधानकर्ता वहां कुछ महत्त्वपूर्ण उपकरण छोड़ देंगे।
एपी
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