नयी दिल्ली, 20 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने कहा है अपीली अदालतों को फौजदारी के मामले में सामान्यतया साक्ष्य को फिर से समझने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि निचली अदालत किसी गवाह के आचरण का आकलन करने के लिये सर्वोत्तम जगह है।
न्यायमूर्ति एन वी रमण, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने लूटपाट के दौरान जानबूझ कर चोट पहुंचाने के अपराध में दोषी व्यक्ति की सजा बरकरार रखने के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील खारिज करते हुये यह टिप्पणी की।
पीठ ने कहा, ‘‘इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि अपीली अदालतों को फौजदारी मामले में सामान्यतया साक्ष्य फिर से नहीं समझने हैं। यह सिर्फ प्रक्रियागत, सुविधा या निश्चयात्मक कारणों के लिये नहीं है बल्कि इसलिए कि किसी गवाह के आचरण और रिकार्ड पर मौजूद दूसरे साक्ष्यों को समझने के लिये निचली अदालत सर्वोत्तम स्थान है। ’’
अभियोजन के अनुसार 17 मई, 2001 को शाहदरा में पीड़ित शिकायतकर्ता तब्बान खान से तीन लड़कों ने 30,000 रुपए लूट लिये थे। पुलिस ने तीन दिन बाद तीनों लड़कों को एक बस स्टैंड से गिरफ्तार कर लिया था ओर अपीलकर्ता मोहम्मद अनवर और दूसरे सह-आरोपी से एक चाकू बरामद किया था।
निचली अदालत ने तीनों अभियुक्तों को पीड़ित को लूटने की मंशा से जख्मी करने के जुर्म में सात साल की सश्रम कैद की सजा सुनायी थी। अदालत ने शस्त्र कानून के तहत उन्हें दो साल की सश्रम कैद और पांच हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनायी थी। जुर्माना अदा नहीं करने पर छह महीने की और सजा भुगतनी थी।
अपीलकर्ता अनवर ने इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जिसने लूटपाट का आरोप निरस्त कर लिया लेकिन इसकी जगह उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 394 में दोषी ठहराते हुये उसकी सजा घटाकर दो साल की सश्रम कैद कर दी थी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि गवाहों के बयान अकाट्य हैं और एक दूसरे से मिलते हैं। न्यायालय ने कहा कि जख्मी करके लूटपाट करने का अपराध गवाह की गवाही और दूसरे साक्ष्य से साबित हो चुका है।
न्यायालय ने कहा कि अपीलकर्ता को झूठा फंसाने और असली अपराधी को बचाने की शिकायतकर्ता की कोई मंशा नहीं थी।
न्यायालय ने पाया कि जमानत पर छूटे अपीलकर्ता का अब कोई अता पता नहीं है और सरकारी वकील का कहना है कि वह बताये गये पते पर पिछले आठ साल से नहीं रह रहा है।
अनूप
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