देश की खबरें | किसान आंदोलन के 100 दिन पूरे, हरियाणा में किसानों ने एक्सप्रेसवे अवरुद्ध किया; तोमर ने कहा, सरकार कानूनों में संशोधन के लिए तैयार
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. केन्द्र के नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन के 100 दिन पूरे होने पर किसान नेताओं ने शनिवार को कहा कि प्रदर्शनकार कर रहे संगठन कानूनों को वापस लिये जाने की अपनी मांग पर अडिग हैं। साथ ही किसान नेताओं ने कहा कि वे सरकार के साथ वार्ता को तैयार हैं, लेकिन बातचीत बिना शर्त होनी चाहिए। वहीं सरकार का कहना है कि वह आंदोलनकारी किसानों की भावनाओं का सम्मान करते हुए कानूनों में संशोधन के लिए तैयार है।
चंडीगढ़/नयी दिल्ली, छह मार्च केन्द्र के नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन के 100 दिन पूरे होने पर किसान नेताओं ने शनिवार को कहा कि प्रदर्शनकार कर रहे संगठन कानूनों को वापस लिये जाने की अपनी मांग पर अडिग हैं। साथ ही किसान नेताओं ने कहा कि वे सरकार के साथ वार्ता को तैयार हैं, लेकिन बातचीत बिना शर्त होनी चाहिए। वहीं सरकार का कहना है कि वह आंदोलनकारी किसानों की भावनाओं का सम्मान करते हुए कानूनों में संशोधन के लिए तैयार है।
इससे पहले दिन में हजारों किसानों ने हरियाणा के कुछ स्थानों पर कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेस-वे को अवरुद्ध किया। दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन के 100 दिन पूरे होने पर किसानों ने रास्ता जाम करके अपना विरोध दर्ज कराया।
कांग्रेस ने किसान आंदोलन के 100 दिन पूरे होने की पृष्ठभूमि में सरकार पर अन्नदाताओं के साथ ‘अत्याचार करने’ का आरोप लगाया और कहा कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार सुनिश्चित होने पर ही आंदोलन कर रहे किसानों की जीत का रास्ता खुलेगा।
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया, ‘‘देश की सीमा पर जान बिछाते हैं जिनके बेटे, उनके लिए कीलें बिछाई हैं दिल्ली की सीमा पर। अन्नदाता मांगे अधिकार, सरकार करे अत्याचार!’’
केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि सरकार आंदोलनकारी किसानों की भावनाओं का सम्मान करते हुए केन्द्र के नए कृषि कानूनों में संशोधन के लिए तैयार है। साथ ही उन्होंने कृषि-अर्थव्यवस्था की कीमत पर इस मुद्दे को लेकर राजनीति करने और किसानों के हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए विपक्षी दलों पर निशाना साधा।
उन्होंने कहा कि सरकार ने कृषि क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने और किसानों को अपनी उपज कहीं भी बेचने की आजादी देने के लिए तीनों कानून बनाए। साथ ही किसानों को इससे उनके द्वारा फसलों का निर्धारित मूल्य मिल सकेगा।
तोमर ने कहा, ‘‘मैं यह मानता हूं कि लोकतंत्र में असहमति का अपना स्थान है, विरोध का भी स्थान है, मतभेद का भी अपना स्थान है। लेकिन क्या विरोध इस कीमत पर किया जाना चाहिए कि देश का नुकसान हो।’’
उन्होंने कहा, ‘‘लोकतंत्र है तो राजनीति करने की स्वतंत्रता सबको है। लेकिन क्या किसान को मारकर राजनीति की जाएगी, किसान का अहित करके राजनीति की जाएगी, देश की कृषि अर्थव्यवस्था को तिलांजलि देकर अपने मंसूबों को पूरा किया जाएगा, इस पर निश्चित रूप से नई पीढ़ी को विचार करने की जरुरत है।’’
इस बीच, संयुक्त किसान मोर्चा के वरिष्ठ सदस्य दर्शन पाल ने कहा कि किसान संगठन कृषि कानूनों को वापस लिए जाने की अपनी मांग पर अडिग हैं।
पाल ने पीटीआई- से कहा, ''आंदोलन की शुरुआत से हमारी मां कानूनों को वापस लेने की रही है। हम सरकार से वार्ता बहाली के लिए तैयार हैं। लेकिन, ऐसा बिना किसी पूर्व शर्त के होना चाहिए।''
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)