Alimony After Divorce: तलाक के बाद आपका साथी कानूनी तौर पर कितना गुजारा भत्ता मांग सकता है? जानिए अपने अधिकार और नियम

भारत में तलाक केवल भावनात्मक चुनौती ही नहीं लाता, बल्कि कई बार इसके साथ वित्तीय परेशानियां भी जुड़ी होती हैं. खासतौर पर उन लोगों के लिए जो आर्थिक रूप से अपने जीवनसाथी पर निर्भर थे.

Photo- Pixabay

Alimony After Divorce: भारत में तलाक केवल भावनात्मक चुनौती ही नहीं लाता, बल्कि कई बार इसके साथ वित्तीय परेशानियां भी जुड़ी होती हैं. खासतौर पर उन लोगों के लिए जो आर्थिक रूप से अपने जीवनसाथी पर निर्भर थे. ऐसे हालात में कोर्ट 'अलिमोनी' यानी गुजारे भत्ते का प्रावधान करती है, ताकि अलग हुए साथी को सम्मानजनक जीवन जीने में मदद मिल सके.

ये भी पढें: महिला ने पति से गुजारा भत्ता में मांगी BMW और आलीशान फ्लैट, 18 महीने पहले हुई थी शादी; कोर्ट बोला, ‘पढ़ी-लिखी हो, खुद कमाओ’

तलाक गुजारा भत्ते के प्रकार (Types of Divorce Alimony)

1. स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony): यह तलाक के बाद लगातार मिलने वाला भत्ता है, जो तब तक जारी रहता है जब तक प्राप्त करने वाले की मृत्यु या दोबारा शादी न हो जाए.

2. अंतरिम गुजारा भत्ता (Temporary Alimony/Interim Maintenance): यह तलाक की प्रक्रिया पूरी होने तक का खर्च कवर करता है, जिसमें वकील की फीस और रोज़मर्रा के खर्च शामिल हैं.

3. पुनर्वास गुजारा भत्ता (Rehabilitative Alimony) : यह सीमित समय के लिए दिया जाता है, ताकि साथी पढ़ाई या नौकरी करके आत्मनिर्भर बन सके.

4. मुआवजा गुजारा भत्ता (Reimbursement/Compensatory Alimony): जब एक साथी परिवार की ज़िम्मेदारियों के कारण करियर छोड़ देता है, तो उसकी भरपाई इस प्रकार से की जाती है.

5. एकमुश्त गुजारा भत्ता (Lump Sum Alimony): एकमुश्त राशि दी जाती है, जिससे आगे बार-बार कोर्ट के चक्कर लगाने की ज़रूरत नहीं होती.

6. नाममात्र  गुजारा भत्ता (Nominal Alimony): जब तत्काल ज़रूरत न हो, लेकिन भविष्य में हो सकती है, तब कोर्ट कम रकम तय करता है ताकि अधिकार सुरक्षित रहे.

अलग-अलग धर्मों में नियम

आय, भविष्य और बच्चों की जरूरतें

कोर्ट अलिमोनी तय करते समय पति-पत्नी दोनों की आय, भविष्य की कमाई की क्षमता और बच्चों की विशेष ज़रूरतों को भी ध्यान में रखता है. उदाहरण के लिए झारखंड हाई कोर्ट ने एक केस में पति की असली आय RTI से सामने आने के बाद पत्नी का गुज़ारा भत्ता 90 हज़ार रुपये कर दिया था. साथ ही उनके ऑटिस्टिक बच्चे की देखभाल का खर्च भी माना गया.

वित्तीय तैयारी क्यों जरूरी

तलाक के बाद आर्थिक रूप से सुरक्षित रहने के लिए अलग बैंक खाता खोलना, बीमा और निवेश में नाम अपडेट करना, संयुक्त कर्जों से नाम हटाना बेहद ज़रूरी है. एकमुश्त अलिमोनी टैक्स-फ्री होती है, लेकिन मासिक राशि टैक्सेबल मानी जाती है. बच्चे की पढ़ाई और स्वास्थ्य से जुड़े खर्च अलग से तय किए जाते हैं.

सही सलाह लें

तलाक की प्रक्रिया में न केवल एक अच्छे वकील बल्कि वित्तीय सलाहकार की भी ज़रूरत पड़ सकती है. सही प्लानिंग से आप अपने भविष्य को सुरक्षित बना सकते हैं और नए सिरे से आत्मनिर्भर जीवन शुरू कर सकते हैं.

Share Now

\