पश्चिम बंगाल चुनाव में महिला वोटरों को लुभाने की होड़
भारत के कई राज्यों में चुनाव जीतने के लिए महिला वोटरों को अलग से योजनाओं और रकम से लुभाने की परंपरा लगातार बढ़ रही है.
भारत के कई राज्यों में चुनाव जीतने के लिए महिला वोटरों को अलग से योजनाओं और रकम से लुभाने की परंपरा लगातार बढ़ रही है. पश्चिम बंगाल में भी तमाम दलों ऐसे प्रयास करते दिख रहे हैं.बीते साल के आखिर में बिहार चुनाव से पहले राज्य में 1.40 करोड़ महिलाओं के 10-10 हजार की रकम भेजी गई थी. इसने एनडीए की सत्ता में वापसी में अहम भूमिका निभाई थी. इसी तरह बीजेपी के शासन वाले असम में भी सरकार ने चुनाव के एलान से ठीक पहले 10 मार्च को 40 लाख महिलाओं के खाते में अरुणोदय योजना के तहत करीब छत्तीस सौ करोड़ की रकम भेजी. सरकार ने इसके अलावा महिलाओं के लिए कई अन्य योजनाएं भी शुरू की हैं. बीजेपी को उनके बूते राज्य में जीत की हैट्रिक बनाने का भरोसा है.
विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में भी महिला वोटर ज्यादातर सीटों पर निर्णायक स्थिति में हैं. इसलिए सत्ता के दावेदारों में उनको अपने पाले में खींचने की होड़ मची है. दिल्ली स्थित सेंटर फार स्टडी आफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) की ओर से वर्ष 2019 में हुए एक अध्ययन में कहा गया था कि देश में तृणमूल कांग्रेस अकेली ऐसी पार्टी है जिले पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के वोट ज्यादा मिलते हैं.
ममता बनर्जी के सामने कैसी हैं चुनौतियां
राज्य में 15 साल से सत्ता में रही ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को इस बार कानून व्यवस्था की स्थिति और खासकर महिला सुरक्षा के मुद्दे पर गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. आरोप लगते रहे हैं कि एक महिला मुख्यमंत्री के राज में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं.
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वर्ष 2024 में पहले संदेशखाली में दर्जनों महिलाओं के साथ कथित रेप और यौन उत्पीड़न का मामला हो चाहे कोलकाता के आर.जी. कर अस्पताल में एक जूनियर डाक्टर के साथ रेप और हत्या का मामला या फिर बीते साल कोलकाता के ही एक ला कालेज में एक छात्रा के साथ सामूहिक बल्ताकार की घटना, सरकार लगातार कटघरे में रही है. इसका सियासी फायदा उठाने के लिए ही बीजेपी ने आर.जी.कर कांड की पीड़िता की मां को उत्तर 24-परगना जिले की पानीहाटी सीट से मैदान में उतार दिया है. उन्होंने राज्य से तृणमूल कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंकने की अपील के साथ अपना चुनाव अभियान भी शुरू कर दिया है.
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विश्लेषक और कोलकाता की रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर विश्वनाथ चक्रवर्ती डीडब्ल्यू से कहते हैं, "एसआईआर के दौरान महिला वोटरों के नाम ज्यादा कटने से खासकर नजदीकी मुकाबले वाली सीटों के नतीजे बदलने की संभावना है."
निर्णायक है महिलाओं की भागीदारी
बंगाल में बीते दो दशकों के दौरान होने वाले चुनावी आंकड़ों को देखें तो राज्य में महिला वोटरों की अहमियत समझ में आती है. चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2006 के विधानसभा चुनाव में जहां 80.75 फीसदी महिलाओं ने वोट डाले, वहीं पांच साल बाद यह आंकड़ा बढ़ कर 84.45 फीसदी तक पहुंच गया. वर्ष 2016 में यह रिकार्ड 94.42 फीसदी रहा. वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान महिलाओं के मतदान (81.75) का प्रतिशत पुरुषों (81.37) के मुकाबले कुछ ज्यादा रहा.
राज्य की कम से कम दो दर्जन विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां महिला वोटरों की तादाद पुरुषों से ज्यादा है. इन महिला वोटरों ने ही वर्ष 2021 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की कड़ी चुनौती से निपटने में ममता बनर्जी की मदद की थी. वर्ष 2021 के नतीजों के विश्लेषण से साफ है कि उस समय तृणमूल कांग्रेस को महिलाओं के 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे जबकि बीजेपी के मामले में यह आंकड़ा 37 फीसदी था.
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "राज्य की चुनावी राजनीति में महिलाओं की भूमिका हमेशा अहम रही है. सरकार की कल्याण योजनाओं के कारण अगले महीने होने वाले चुनाव में यह सिलसिला जारी रहने की उम्मीद है."
महिलाओं के लिए खास सरकारी योजनाओं में रकम बढ़ाई
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार को जिन योजनाओं से चुनावी फायदा मिलता है उनमें लक्ष्मी भंडार सबसे महत्वपूर्ण है. इस बार ठीक चुनाव से पहले मुख्यमंत्री ने इसके तहत महिलाओं को हर महीने मिलने वाली रकम पांच-पांच सौ रुपए बढ़ा दी है. इसके तहत पहले हर महीने पांच सौ रुपये देने की बात कही गई थी. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ममता ने यह रकम पांच सौ रुपए बढ़ा दी थी और अब चुनाव से ठीक पहले इसमें और पांच सौ रुपए जोड़ दिए गए हैं. वर्ष 2016 के चुनाव में ममता बनर्जी के समर्थन के बाद सरकार ने महिलाओं के हित में कन्याश्री और रूपश्री जैसी योजनाएं शुरू की थी. इनके तहत लड़कियों को शिक्षा और शादी के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है.
विश्लेषकों का कहना है कि राज्य की महिलाएं अब एक मजबूत वोट बैंक के तौर उभरी हैं. कल्याण योजनाएं, बैंक खातों में सीधे रकम पहुंचने और सशक्तिकरण के अहसास ने महिलाओं और राज्य सरकार के बीच एक मजबूत राजनीतिक संबंध बना दिया है. उत्तर बंगाल के एक कालेज में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाली डॉ. चैताली मजूमदार डीडब्ल्यू से कहती हैं, "खासकर लक्ष्मी भंडार जैसी योजना के तहत महिलाओं के खाते में हर महीने सीधे वित्तीय सहायता पहुंचने के कारण कमजोर तबके की महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हुई हैं. इससे ममता बनर्जी पर उनका भरोसा बढ़ा है. चुनाव के मौके पर यही भरोसा वोटों में बदलता है."
तृणमूल कांग्रेस के उपाध्यक्ष जय प्रकाश मजूमदार डीडब्ल्यू से बातचीत में मानते हैं कि पार्टी को इन कल्याण योजनाओं का फायदा मिला है. उनका कहना था, "हमारा मकसद ज्यादा से ज्यादा महिला और अल्पसंख्यक वोटरों को मतदान केंद्रों तक पहुंचाना है."
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वहीं भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस पर महिलाओं को वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है. लेकिन पार्टी की वरिष्ठ नेता और राज्य की महिला व बाल कल्याण मंत्री शशी पांजा डीडब्ल्यू से कहती हैं, "हम बीजेपी की तरह महिलाओं को महज वोट बैंक नहीं मानते. सरकार ने उनके आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण पर खास ध्यान दिया है."
भाजपा ने बंगाल में कानून व व्यवस्था की स्थिति और महिला सुरक्षा को अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया है. विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि एक महिला के राज में भी बंगाल की महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. अपने आरोप के समर्थन में वह संदेशखाली के अलावा आर जी कर और लॉ कॉलेज की घटना की मिसाल देते हैं. बंगाल चुनाव में महिला वोटरों की अहमियत को ध्यान में रखते हुए ही बीजेपी ने सत्ता में आने पर लक्ष्मी भंडार की रकम बढ़ा कर हर महीने तीन हजार करने का भरोसा दिया है.
लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने अपने चुनाव अभियान में इस बात पर खास जोर दे रही है कि बीजेपी के यहां सत्ता में आने पर यह तमाम योजनाएं बंद हो जाएंगी. इससे महिला वोटर सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में लामबंद हो रही हैं. लेकिन तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सांसद सौगत रॉय डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बीजेपी-शासित राज्यों में महिलाओं की स्थिति किसी से छिपी नहीं है. इसलिए पार्टी को कम से कम महिला सुरक्षा के मुद्दे पर बोलने या सरकार की आलोचना करने का कोई हक नहीं है.”
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महिलाओं के साथ ही राज्य के युवा तबके का समर्थन हासिल करने के लिए सरकार ने हाल में ही युवा साथी योजना के तहत दसवीं पास बेरोजगार युवकों को हर महीने डेढ़ हजार रुपए की आर्थिक मदद देने का एलान किया था. यह रकम 21 से 40 साल तक की उम्र के युवाओं को मिलेगी. इस साल शुरू की गई युवा साथी योजना के 84 लाख से ज्यादा आवेदन मिले हैं. पहले उनको एक अप्रैल से भत्ता मिलना था. लेकिन चुनाव को ध्यान में रखते हुए मार्च के पहले सप्ताह से ही इसका वितरण शुरू हो गया है. ममता बनर्जी को उम्मीद है कि राज्य सरकार की ओर से शुरू की गई तमाम योजनाएं प्रतिष्ठान विरोधी लहर से लड़ने में पार्टी का मजबूत हथियार बनेगी.