नयी दिल्ली, चार फरवरी उच्चतम न्यायालय ने यूएपीए के उन प्रावधानों में संशोधन के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई करने से मंगलवार को इनकार कर दिया जिनमें सरकार को व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करने और उनकी संपत्तियां जब्त करने का अधिकार है।
प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय से मामले की सुनवाई करने को कहा।
पीठ ने कहा, ‘‘हम पहली अदालत नहीं हो सकते। बहुत सारी समस्याएं पैदा होती हैं, कभी-कभी मुद्दे आपके पक्ष (याचिकाकर्ता) द्वारा छोड़े जाते हैं, कभी-कभी उनके पक्ष (केंद्र) द्वारा, तब हमें एक बड़ी पीठ को संदर्भित करना पड़ता है। पहले उच्च न्यायालय द्वारा इसका निर्णय किया जाए।’’
शीर्ष अदालत ने छह सितंबर, 2019 को गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) में 2019 के संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र को नोटिस जारी किया था।
पीठ ने कहा कि अन्य उच्च न्यायालय भी यूएपीए संशोधनों के खिलाफ नयी याचिकाओं पर विचार कर सकते हैं।
अदालत सजल अवस्थी, ‘एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स’ (एपीसीआर) और अमिताभ पांडे द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे मामलों में अक्सर जटिल कानूनी मुद्दे उठते हैं और उच्च न्यायालयों के लिए पहले इसका परीक्षण करना उचित होगा। याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सी यू सिंह ने शीर्ष अदालत से मामले की सुनवाई करने का आग्रह करते हुए कहा कि उसने पांच साल पहले नोटिस जारी किया था।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि याचिकाओं का निपटारा करने के बजाय, मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किया जा सकता है, क्योंकि याचिकाकर्ताओं के लिए इसमें कुछ कठिनाइयां हैं। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं में से कई सेवानिवृत्त नौकरशाह हैं।
सिंह ने कहा, ‘‘हमारे मामले में, हम सभी सेवानिवृत्त प्रतिष्ठित नौकरशाह हैं। हमने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की है, और हमारे लिए कई उच्च न्यायालयों में याचिकाएं दायर करना असुविधाजनक होगा।’’
निवेदन को स्वीकार करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि याचिकाओं को दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा।
अवस्थी ने अपनी याचिका में कहा कि संशोधित प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों जैसे समानता का अधिकार, वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अलावा जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं।
याचिका में कहा गया है कि यूएपीए, 2019 आतंकवाद पर अंकुश लगाने की आड़ में सरकार को असहमति के अधिकार पर अप्रत्यक्ष प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है, जो विकासशील लोकतांत्रिक समाज के लिए हानिकारक है। संशोधित कानून में आतंकवादी घोषित किये जाने पर ऐसे व्यक्तियों पर यात्रा प्रतिबंध लगाने का भी प्रावधान है।
एपीसीआर ने अधिवक्ता फौजिया शकील के माध्यम से दायर अपनी अलग जनहित याचिका में कहा कि ये संशोधन संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रतिष्ठा और गरिमा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हैं, और इसके लिए कोई ठोस और प्रक्रियागत प्रक्रिया नहीं अपनाई गई है।
याचिका में कहा गया है, ‘‘किसी व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिए बिना उसे आतंकवादी घोषित करना उस व्यक्ति की प्रतिष्ठा और सम्मान के अधिकार का उल्लंघन है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक पहलू है।’’
याचिका में कहा गया है कि संशोधित अधिनियम की धारा 35 में यह उल्लेख नहीं किया गया है कि किसी व्यक्ति को कब आतंकवादी घोषित किया जा सकता है। इसमें कहा गया कि सरकार के महज विश्वास के आधार पर किसी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करना मनमाना और ज्यादती है।
याचिका में कहा गया है किसी व्यक्ति को आतंकी घोषित करने की अधिसूचना के आधार के बारे में कभी नहीं बताया जाता है, इसलिए अधिनियम में प्रावधान के अनुसार धारा 36 के तहत उसकी अधिसूचना को चुनौती देने का उपाय व्यावहारिक रूप से निरर्थक है।
इन सब दलीलों के साथ याचिका में यूएपीए की धारा 35 और 36 को असंवैधानिक घोषित करने का अनुरोध किया गया है।
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