देश की खबरें | मणिपुर में लंबे समय से थी हिंसा भड़कने की आशंका, मेइती मुद्दे ने किया चिंगारी का काम

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(फंजौबाम चिंगखींगानबा)

इम्फाल, पांच मई मणिपुर बीते कुछ दिन से जिस जातीय हिंसा की चपेट में है, उसके लक्षण पिछले कुछ दिनों से साफ नजर आ रहे थे। इम्फाल घाटी और इसके आसपास की पहाड़ियों में जातीय समूहों के बीच एक-दूसरे पर संदेह करने का लंबा इतिहास रहा है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली मणिपुर सरकार द्वारा आरक्षित वनों से आदिवासी ग्रामीणों को बेदखल किए जाने का अभियान शुरू होने के बाद यह मामला भीषण संघर्ष में बदल गया।

बहुसंख्यक मेइती समुदाय को अनसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिए जाने के फैसले के खिलाफ आदिवासी समूहों के विरोध प्रदर्शन ने हिंसा की आग भड़काने में चिंगारी का काम किया। पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदाय को आजादी के बाद दशकों से अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला हुआ है।

मणिपुर में सरकार भले ही किसी भी पार्टी की रहे, लेकिन दबदबा हमेशा मैदानी इलाकों में रहने वाले मेइती समुदाय का रहा है। राज्य की कुल आबादी में मेइती समुदाय से संबंध रखने वाले लोगों की संख्या लगभग 53 प्रतिशत है। मेइती समुदाय के ज्यादातर लोग इम्फाल घाटी में रहते हैं।

इसके परिणामस्वरूप, सरकार के कार्यों को अक्सर आदिवासियों, विशेष रूप से नागा और कुकी समुदाय के बीच संदेह की नजर से देखा जाता है। मणिपुर में इन दोनों समूहों के लोगों की आबादी लगभग 40 प्रतिशत है और ये ज्यादातर घाटी के आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों में रहते हैं।

दिलचस्प बात यह है उपजाऊ इम्फाल घाटी राज्य के कुल क्षेत्रफल के 10वें हिस्से में स्थित है जबकि राज्य का 90 प्रतिशत हिस्सा पर्वतीय है, जिसे उग्रवादियों के लिए मुफीद ठिकाना माना जाता है। यह पर्वतीय क्षेत्र लंबे समय से उग्रवाद का गढ़ रहा है।

फरवरी में शुरू हुआ बेदखली अभियान एक और आदिवासी-विरोधी कदम है, जिसके चलते न केवल इससे प्रभावित कुकी समुदाय बल्कि उन अन्य आदिवासियों के बीच भी व्यापक आक्रोश और नाराजगी है, जिनके कई गांव आरक्षित वन क्षेत्र में आते हैं।

पिछले सप्ताह मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के चुराचंदपुर जिले के दौरे से पहले भीड़ ने न्यू लमका कस्बे में उस स्थान पर तोड़फोड़ की और आग लगा दी, जहां वह एक समारोह को संबोधित करने वाले थे। भीड़ ने एक नवस्थापित ओपन जिम को आंशिक रूप से आग लगा दी जिसका उद्घाटन बहुसंख्यक मेइती समुदाय से संबंध रखने वाले मुख्यमंत्री सिंह शुक्रवार दोपहर को करने वाले थे।

यह हमला पूरे चुराचंदपुर जिले में स्वदेशी जनजाति नेताओं के मंच द्वारा बुलाए गए 'संपूर्ण बंद' से बमुश्किल 11 घंटे पहले हुआ।

फोरम ने दावा किया कि बेदखली अभियान का विरोध करते हुए सरकार को बार-बार ज्ञापन सौंपने के बावजूद, “सरकार ने लोगों की परेशानियों को दूर करने की इच्छा या ईमानदारी का कोई संकेत नहीं दिखाया है।”

कुकी छात्र संगठन, चुराचंदपुर के महासचिव डीजे हाओकिप ने ‘पीटीआई-’ को बताया, “पहाड़ी जिले के कई क्षेत्रों को आरक्षित वन, संरक्षित वन घोषित किया गया है और सैकड़ों कुकी आदिवासियों को उनके पारंपरिक बस्ती क्षेत्र से हटा दिया गया है।”

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