देश की खबरें | राज्यसभा सचिवालय ने सदस्यों को संसदीय परंपरा, चलन और आचार-व्यवहार की याद दिलायी

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नयी दिल्ली, 30 नवंबर संसद के सोमवार से शुरू होने वाले शीतकालीन सत्र से पहले राज्यसभा सचिवालय ने विस्तृत दिशानिर्देश जारी करते हुए सदस्यों को सदन के अंदर संसदीय परंपरा, चलन और आचार-व्यवहार का पालन करने की याद दिलायी है।

इसमें सदस्यों से सदन की गरिमा को बनाये रखने, महत्वपूर्ण विषयों को उठाने से संबंधित नोटिस को राज्यसभा के अध्यक्ष की मंजूरी से पहले प्रचारित नहीं करने आदि का आग्रह किया गया है।

संसद का शीतकालीन सत्र चार दिसंबर से शुरू हो रहा है और यह 22 दिसंबर तक चलेगा। इस दौरान 15 बैठकें होंगी जिनमें कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा की जा सकती है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के ठीक बाद शुरू होने वाले संसद का यह सत्र काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

राज्यसभा सचिवालय के 29 नवंबर के बुलेटिन के अनुसार, ‘‘ सदस्यों का ध्यान संसदीय परंपरा और चलन से संबंधित उच्च सदन की पुस्तिका के पृष्ट 71-73 की ओर दिलाया जाता है। इसमें खास तौर पर संसदीय रिवाज, चलन और आचार व्यवहार पर ध्यान देने का अनुरोध किया जाता है।’’

इसके अनुसार, सदन की कार्यवाही की गंभीरता और आचार का तकाजा है कि सदन में ‘धन्यवाद’, ‘जय हिन्द’, ‘वंदे मातरम्’’ या किसी तरह के अन्य नारे नहीं लगाये जाने चाहिए।

इसमें यह भी कहा गया है कि सदन के चलन के अनुरूप आसन की ओर से सदन में व्यवस्था दी जाती है और जहां कोई पूर्व का चलन नहीं है, वहां सामान्य संसदीय व्यवस्था का पालन किया जाता है। आसन की ओर से दी गई व्यवस्था की सदन के भीतर या बाहर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष आलोचना नहीं की जानी चाहिए।

राज्यसभा सचिवालय के बुलेटिन के अनुसार, सदस्यों का ध्यान संसदीय आचार व्यवहार संबंधी राज्यसभा के सदस्यों से संबंधित पुस्तिका के पृष्ट 73-78 की ओर दिलाया जाता है और उनसे पालन करने की अपेक्षा की जाती है। इसमें कहा गया है कि प्रत्येक सदस्य को सदन में प्रवेश करते या बाहर जाते समय आसन का अभिवादन करना चाहिए। प्रत्येक सदस्य को इस तरह से सदन में प्रवेश करना चाहिए कि सदन की कार्यवाही में बाधा नहीं आए।

सदस्यों को इस प्रकार से आपस में बातचीत नहीं करनी चाहिए जिससे सदन की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न हो। सदस्यों को अपना भाषण समाप्त करने के बाद तत्काल सदन से बाहर नहीं जाना चाहिए।

इसमें यह भी कहा गया है कि संसदीय रिवाज और चलन के अनुरूप सदन में किसी विषय को उठाने के लिए दिये गए नोटिस का प्रचार किसी सदस्य या अन्य व्यक्ति को तब तक नहीं करना चाहिए, जब तक उसे अध्यक्ष स्वीकार नहीं कर लेते हैं। अध्यक्ष के समक्ष नोटिस विचाराधीन रहने तक सदस्य को उस विषय को सदन में नहीं उठाना चाहिए।

दीपक

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