देश की खबरें | संसदीय समिति ने लोक सेवकों पर हमले संबंधी कानून में सजा का प्रावधान घटाकर एक साल करने की सिफारिश की

नयी दिल्ली, 30 नवंबर संसद की एक समिति ने सिफारिश की है कि लोक सेवक को उसके कर्तव्य का निर्वहन करने से रोकने के लिए हमला करने या आपराधिक बल का इस्तेमाल करने वाले किसी भी व्यक्ति को दी जाने वाली दो साल की कैद की सजा को घटाकर एक साल कर दिया जाना चाहिए।

समिति की यह सिफारिश कुछ सांसदों की ओर से संबंधित कानून के बड़ी संख्या में ‘दुरुपयोग’ की शिकायतों के बाद आई है।

भाजपा सदस्य बृजलाल की अध्यक्षता वाली गृह मामलों पर संसद की स्थायी समिति ने तीन प्रस्तावित आपराधिक कानूनों की जांच के बाद यह सिफारिश की।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि समिति के कुछ सदस्यों ने बताया है कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 353, जो भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 130 से मेल खाती है, का ‘निवारण के नाम पर लोक सेवकों द्वारा व्यापक रूप से दुरुपयोग किया जाता है’।

रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘चूंकि राजनीतिक प्रदर्शन लोकतंत्र की आत्मा हैं और अतीत में ऐसे उदाहरण हैं जब राजनीतिक नेताओं को प्रदर्शन करते समय आईपीसी की इस धारा के तहत अपराधों के लिए परेशान किया गया और झूठा दोषी ठहराया गया, इसलिए, यह सुझाव दिया गया कि इस खंड के तहत सजा को कम किया जा सकता है।’’

इसमें कहा गया है, ‘‘समिति उसके समक्ष दी गई दलीलों से सहमत है और सिफारिश करती है कि धारा 130 के तहत दी गई सजा को दो साल से घटाकर एक साल किया जा सकता है।’’

बीएनएस की धारा 130 के तहत लोक सेवक को अपने कर्तव्य के निष्पादन में रोकने या हमला करने के लिए दो वर्ष तक के कारावास या जुर्माना, या दोनों से दंडित किए जाने का प्रावधान है।

भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस-2023) विधेयक को 11 अगस्त को लोकसभा में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसए-2023) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए-2023) विधेयकों के साथ पेश किया गया था।

तीन प्रस्तावित कानून क्रमशः दंड प्रक्रिया संहिता अधिनियम, 1898, भारतीय दंड संहिता, 1860 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 को प्रतिस्थापित करेंगे।

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)