देश की खबरें | अवैध बैनर को लेकर केजरीवाल और अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश

नयी दिल्ली, 11 मार्च दिल्ली की एक अदालत ने सार्वजनिक संपत्ति को विरूपित करने के मामले में ‘आप’ प्रमुख एवं पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का मंगलवार को आदेश दिया।

अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नेहा मित्तल ने कहा कि शिव कुमार सक्सेना नाम के व्यक्ति ने समय और तारीख के साथ ऐसे साक्ष्य पेश किए हैं, जिनसे पता चलता है कि अवैध बैनर पर केजरीवाल और अन्य आरोपियों के नाम के साथ-साथ उनकी तस्वीरें भी प्रकाशित की गई थीं।

अदालत ने केजरीवाल के अलावा मटियाला से आम आदमी पार्टी (आप) के पूर्व विधायक गुलाब सिंह और द्वारका की पूर्व पार्षद नितिका शर्मा के खिलाफ भी “बड़े आकार” के बैनर लगाने के लिए प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया।

अदालत ने कहा, “अपराध की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह न केवल आंखों में खटकने वाला और सार्वजनिक परेशानी पैदा करने वाला है, जिससे शहर की सुंदरता नष्ट हुई, बल्कि यातायात में बाधा डालकर उसके सुचारू प्रवाह के लिए भी खतरनाक है और पैदल चलने वाले राहगीरों तथा वाहन चालकों की सुरक्षा के समक्ष चुनौती पेश करता है। भारत में अवैध होर्डिंग गिरने और इससे लोगों की जान जाने की घटनाएं कोई नयी बात नहीं हैं।”

साक्ष्य का संज्ञान लेते हुए अदालत ने कहा कि “बैनर बोर्ड या होर्डिंग लगाना” अधिनियम की धारा-3 के तहत संपत्ति को विरूपित करने के समान है।

उसने कहा, “(पूर्ववर्ती) दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा-156 (3) (संज्ञेय अपराध में पुलिस जांच का आदेश देने की मजिस्ट्रेट की शक्ति) के तहत दायर आवेदन स्वीकार किए जाने योग्य है।”

अदालत ने कहा कि संबंधित थाना प्रभारी (एसएचओ) को “दिल्ली संपत्ति विरूपण रोकथाम अधिनियम, 2007 की धारा-3” और मामले के तथ्यों से प्रतीत होने वाले किसी भी अन्य अपराध के तहत तत्काल प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया जाता है।

उसने कहा कि अधिनियम की धारा-5 के तहत अपराध को संज्ञेय माना गया है।

अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता से जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ सबूत जुटाने की उम्मीद करना अनुचित होगा और केवल दिल्ली पुलिस ही गहन जांच कर सकती है।

उसने कहा, “जांच एजेंसी यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती कि समय बीत जाने के कारण सबूत नहीं जुटाए जा सके।”

अदालत ने आश्चर्य जताया कि एसएचओ की कार्रवाई रिपोर्ट (एटीआर) में इस बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है कि शिकायतकर्ता की ओर से बताई गई तारीख और समय पर होर्डिंग मौजूद थे या नहीं।

एसएचओ के आचरण की निंदा करते हुए अदालत ने कहा, “एटीआर में की गई यह टिप्पणी कि जांच के दिन कोई होर्डिंग नहीं मिली, जांच एजेंसी द्वारा अदालत को गुमराह करने की कोशिश प्रतीत होती है।”

अदालत ने पुलिस को होर्डिंग से जुड़ी “बातों का खुलासा करने” का निर्देश दिया, खासकर यह कि होर्डिंग की छपाई कहां हुई और इसे किसने लगाया।

अदालत ने सरकारी वकील के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि शिकायत में कुछ लोगों के नाम छूट गए थे।

उसने कहा, “शिकायतकर्ता द्वारा नाम लेना या छोड़ना जांच की दिशा निर्धारित नहीं कर सकता।”

अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी के पास किसी भी व्यक्ति को आरोपी बनाने का पर्याप्त अधिकार है, भले ही उसका नाम शिकायत में न हो।

सक्सेना ने 2019 में आरोप लगाया था कि केजरीवाल, सिंह और शर्मा ने दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के द्वारका में विभिन्न जगहों पर बड़े आकार के होर्डिंग लगाकर जानबूझकर जनता के पैसों का दुरुपयोग किया।

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