सभी दिवाला, कंपनी मामलों में कॉरपोरेट मंत्रालय को पक्ष बनाने जाने का एनसीएलटी का आदेश खारिज

कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय (एमसीए) की अपील को स्वीकार करते हुए अपीलीय न्यायाधिकरण की दो सदस्यीय पीठ ने कहा कि एनसीएलटी का निर्देश उसकी ‘शक्ति से बाहर’ है और ‘नया नियम लगाने के जैसा है। ‘

जियो

नयी दिल्ली, 25 मई राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने ऋण शेधन और कंपनी कार्य संबंधी सभी मामलों में कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय को भी एक पक्ष बनाये जाने के राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के आदेश को खारिज कर दिया है।

कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय (एमसीए) की अपील को स्वीकार करते हुए अपीलीय न्यायाधिकरण की दो सदस्यीय पीठ ने कहा कि एनसीएलटी का निर्देश उसकी ‘शक्ति से बाहर’ है और ‘नया नियम लगाने के जैसा है। ‘

इससे पहले, 22 नवंबर 2019 को एनसीएलटी ने ओरिएंटल बैंक ऑफ कामर्स बनाम सिक्का पेपर मामले में सुनवाई करते हुए निर्देश दिया था कि ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवाला संहिता (आईबीसी) के तहत सभी पीठों के समक्ष दायर आवेदनों में एमसीए को पक्ष बनायाजाए ताकि मामले के समुचित आकलन के लिये वहां से (मंत्रालय) सही रिकॉर्ड उपलब्ध हो।

एनसीएलटी के आदेश को खारिज करते हुए अपीलीय न्यायाधिकरण ने कहा, ‘‘एनसीएलटी ने अपने आदेश को देश भर में अपनी सभी पीठों में लागू किया जो उसके अधिकार में नहीं है और कानून के नजरिये से तय नियमन के खिलाफ है...।’’

न्यायाधीश वेणुगोपाल एम और न्यायाधीश वी पी सिंह की अपीलीय न्यायाधिकरण की पीठ ने कहा कि तार्किक रूप से सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद यह न्यायाधिकरण 22 नवंबर 2019 के आदेश को खारिज करता है।

अपीलीय न्यायाधिकरण ने कहा कि एनसीएलटी ने यह सुनिश्चित करने के लिये यह आदेश दिया कि मामलों का सही तौर पर मूल्यांकन के लिये एमसीए अधिकारी सही रिकार्ड उपलब्ध कराएंगे लेकिन इस प्रकार के व्यापक प्रभाव वाले निर्देश को एक झटके से जारी नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा कि अगर जरूरत पड़ने पर अपीलकर्ता एमसीए सचिव के जरिये जरूरी पक्ष /औपचारिक प्रतिवादी बनाने जाने का आग्रह न्यायाधिकरण के समक्ष करता है तो उसका निर्धारण भी आवश्यकतानुसार केवल मामला-दर-मामला आधार पर हो।

एनसीएलटी के आदेश के तुरंत बाद सरकार अपीलीय न्यायाधिकरण में गयी थी और पिछले साल दिसंबर में आदेश पर उसे रोक मिल गयी थी।

एमसीए ने एनसीएलटी के निर्देश को चुनौती देते हुए कहा था कि केंद्र सरकार को एक औपचारिक पक्ष (प्रोफार्मा प्रतिवादी यानी मामले से सीधे जुड़ा नहीं लेकिन अदालत के आदेश से बंधा हुआ) बनाने का मामला व्यक्तिगत आवेदनकर्ता पर निर्भर करता है और उसे ही इस बारे में निर्णय करना है।

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