देश की खबरें | केरल उच्च न्यायालय ने तानुर नौका हादसे को ‘भयावह’ बताया, स्वत: संज्ञान लिया

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कोच्चि, नौ मई केरल उच्च न्यायालय ने मलप्पुरम जिले के तानुर इलाके में दो दिन पहले हुई नौका दुर्घटना को ‘सदमे में डालने वाला’ और ‘भयावह’ बताया है, साथ ही यह पता लगाने के लिए मामले का स्वत: संज्ञान लिया है कि आखिर अधिकारियों ने कथित रूप से नियमों की अनदेखी कर नौका को संचालित करने की अनुमति क्यों दी।

इस हादसे में 15 बच्चों समेत 22 लोगों की जान चली गई।

न्यायमूर्ति देवन रामचंद्रन और न्यायमूर्ति शोभा अन्नम्मा एपेन की अवकाशकालीन खंडपीठ ने कहा कि उनका ‘दिल रो रहा था’ और बेजान बच्चों को देखने के बाद उनकी ‘रातों की नींद उड़’ गई थी।

अदालत ने कहा कि यह दुर्घटना ‘निष्ठुरता, लालच और अधिकारियों की उदासीनता का घातक’ परिणाम है।

अदालत ने कहा कि वह यह सुनिश्चित करने के लिए याचिका दायर कर रही है कि ऐसी घटना दोबारा न हो।

पीठ ने कहा कि 1924 के बाद से ‘‘नियमित अंतराल’’ पर राज्य में इस तरह की नौका त्रासदी हो रही है, जो डराने वाली है।

वर्ष 1924 में कोल्लम से कोट्टायम जाने वाली एक नौका के पालना में डूबने की घटना में केरल ने महाकवि कुमारनासन को खो दिया था, जो केरल के जाने माने कवियों में से एक थे।

इसने केरल सरकार, मलप्पुरम के जिला पर्यटन संवर्धन परिषद, उस जिले के पुलिस प्रमुख तथा कलेक्टर, तानुर नगरपालिका, अलप्पुझा के बंदरगाह अधिकारी और बेपोर के वरिष्ठ बंदरगाह संरक्षक को जनहित याचिका में शुरुआती तौर पर प्रतिवादी बनाया है। इस जनहित याचिका पर अब 12 मई को सुनवाई होगी।

सुनवाई की अगली तारीख से पहले, मलप्पुरम जिला कलेक्टर को जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अध्यक्ष की उनकी अतिरिक्त भूमिका को ध्यान में रखते हुए मामले में एक रिपोर्ट दर्ज करने का निर्देश दिया गया।

पीठ ने मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए कहा कि जब तक हम मजबूती से इस पर निर्णय नहीं लेते तब तक इस तरह की कई और घटनाएं हो सकती हैं, क्योंकि ओवरलोडिंग, सांविधिक कानूनों के घोर उल्लंघन और आवश्यक सुरक्षा आवश्यकताओं को नजरअंदाज करने की घटनाएं बार-बार बिना किसी डर और सावधानी के होती रहती हैं।

अदालत ने कहा कि इस तरह की हर त्रासदी एक नियमित जांच की आवश्यकता पैदा करती है, लेकिन बाद में सिफारिशें ‘अनसुनी’ हो जाती हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘अंतिम नुकसान नागरिकों का है, किसी और का नहीं, क्योंकि इस तरह के उदाहरण जल्द ही स्मृति लोप का शिकार हो जाते हैं।’’

अदालत ने कहा, ‘‘वर्ष 1924 में महाकवि कुमारनासन सहित 24 लोगों की मौत वाली एक नाव से लेकर 2009 में इडुक्की में दुर्घटनाग्रस्त हुई डबलडेकर यात्री नौका 'जलकन्याका' तक, जिसमें 45 लोगों की मौत हो गई थी और उसके बाद कई दुर्घटनाएं नियमित तौर पर होती रही हैं, भले ही उनमें कम लोगों की जान गयी हो।’’

पीठ ने कहा कि वह स्वत: संज्ञान से जनहित याचिका शुरू कर रही है, क्योंकि वह जानना चाहती है कि किसी भी अधिकारी या प्राधिकार को इस बात की जानकारी क्यों नहीं थी कि तानुर में ऐसी नौकाएं नियमों का उल्लंघन कर चल रही हैं।

पीठ ने पूछा, ‘‘ऐसा कैसे संभव है कि सब कुछ हो रहा है और किसी को कुछ नहीं पता?’’

पीठ ने आगे कहा कि अगर अधिकारियों को अतीत में इस तरह की त्रासदियों के लिए जवाबदेह ठहराया गया होता, तो हालिया घटना से बचा जा सकता था।

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