जरुरी जानकारी | सुधारों के बाद अर्थव्यवस्था को गति देने के लिये उद्योगों को कदम उठाना चाहिये: सीईए

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. भारतीय उद्योग जगत को सरकार द्वारा श्रम क्षेत्र सहित विभिन्न क्षेत्रों में किये गये आर्थिक सुधारों के बाद अब कोविड- 19 महामारी से प्रभावित अर्थव्यवस्था की गति को आगे बढ़ाने के लिए पहल करनी चाहिए चाहिये। मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) के वी सुब्रमणियम ने शुक्रवार को यह कहा।

नयी दिल्ली, 30 अक्टूबर भारतीय उद्योग जगत को सरकार द्वारा श्रम क्षेत्र सहित विभिन्न क्षेत्रों में किये गये आर्थिक सुधारों के बाद अब कोविड- 19 महामारी से प्रभावित अर्थव्यवस्था की गति को आगे बढ़ाने के लिए पहल करनी चाहिए चाहिये। मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) के वी सुब्रमणियम ने शुक्रवार को यह कहा।

उन्होंने कहा कि भारत एकमात्र देश है जिसने मौजूदा संकट में उपलब्ध अवसर का लाभ उठाते हुये दूसरी पीढ़ी के सुधारों को आगे बढ़ाया। ये सुधार उत्पादन के साधनों के बाजारों पर केन्द्रित हैं।

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सुब्रमणियम ने कहा, ‘‘यदि आप वर्ष 1991 में शुरू हुये सुधारों को देखें तो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा आगे बढ़ाये गये सुधारों समेत ज्यादातर सुधार प्राथमिक तौर पर उत्पाद बाजारों पर केन्द्रित रहे हैं। लेकिन यदि आप अब किये जा रहे और पिछले कुछ समय में किये गये सुधारों को देखें तो यह सुधार मूल रूप से पूंजी के क्षेत्र में सुधार लाने का प्रयास हैं। इनमें दिवाला एवं रिण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) जैसे सुधार भी शामिल हैं।’’

सीईए ने कहा आईबीसी के बाद श्रम सुधारों को आगे बढ़ाया गया। उत्पादन में श्रम लागत एक महत्वपूर्ण घटक होता है। कृषि क्षेत्र में भी सुधार किये गये जो कि प्राथमिक क्षेत्र का अहम हिस्सा है।

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वाणिज्य एवं उद्योग मंडल फिक्की द्वारा आयोजित कार्यक्रम में सुबमणियम ने कहा ऐसे में आप यदि इन सभी सुधारों को देखते हैं तो एक अति महत्वपूर्ण विषय वस्तु इसमें है वह आत्मनिर्भर भारत है जो कि प्राथमिक तौर पर निजी क्षेत्र के उद्यमों और क्षेत्र की क्षमता पर निर्भर है।

उन्होंने कहा कि ये सुधार यह बताते हैं कि इस सरकार की मंशा बाजार पर भरोसा करने की है। और बाजार में कुशलता मुख्य रूप से निजी क्षेत्र ही ला सकता है।

उन्होंने कहा ,‘भारतीय कार्पोरेट जगत को अब वास्तव में आगे आने की जरूरत है। हमने श्रम कानूनों में सुधार सहित अन्य कदम उठाये हैं ... अब भारतीय संदर्भ में नीतिपरक संपत्ति सृजन के लिये व्यापक और अधिक अवसर मौजूद हैं .. मैं इस विचार को भारतीय उद्योग जगत में फैलते हुये देखना चाहता हूं।’’

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