नयी दिल्ली, सात फरवरी उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि यदि राज्यपाल विधानसभा में पारित विधेयकों पर राज्य सरकार को कोई सूचना दिए बिना अपनी मंजूरी नहीं देते हैं तो इससे ‘‘गतिरोध’’ पैदा हो सकता है।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा कि तमिलनाडु के राज्यपाल आर एन रवि (विधेयक के) केन्द्रीय कानून से असंगत होने की धारणा के आधार पर अपनी राय बताए बिना विधेयकों को रोककर नहीं रख सकते।
पीठ ने न्यायालय में राज्यपाल का प्रतिनिधित्व कर रहे अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से पूछा, ‘‘यदि राज्यपाल को प्रथम दृष्टया लगता है कि विधेयक में कुछ विरोधाभासी प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं, तो क्या उन्हें इसे राज्य सरकार के संज्ञान में नहीं लाना चाहिए? सरकार से यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह राज्यपाल के मन की बात जान ले?’’
पीठ ने कहा, ‘‘यदि कोई ऐसी बात थी जिससे राज्यपाल परेशान थे, तो राज्यपाल को इसे तुरंत सरकार के संज्ञान में लाना चाहिए था, जिससे सरकार उक्त विधेयकों पर पुनर्विचार कर सकती थी।’’
न्यायालय ने कहा, ‘‘यदि आपका मानना है कि यह विधेयक केंद्रीय कानून के अनुरूप नहीं है, तो आपको सूचित करना होगा। राज्यपाल को कुछ ऐसा कहना होगा कि मैं इस विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ भेज रहा हूं। अन्यथा गतिरोध पैदा हो जाएगा। यदि आप गतिरोध पैदा करते हैं, तो आपको गतिरोध को दूर करना होगा।’’
अटॉर्नी जनरल ने कहा, ‘‘मंजूरी को रोककर रखने का मतलब स्वीकृति नहीं देना है।’’
उन्होंने कहा कि जब राष्ट्रपति ने मंजूरी को रोकने का फैसला किया, जैसा कि इन मामलों में राष्ट्रपति द्वारा सूचित किया गया है, तो इसका मतलब था कि विधेयक असंगत थे।
हालांकि, पीठ ने कहा कि यह बात दलील स्वीकार करने के लिए प्रावधानों की सही व्याख्या नहीं हो सकती, क्योंकि अनुच्छेद 200 और 201 के तहत प्रावधान निरर्थक हो जाएंगे।
वेंकटरमणी ने कहा कि वह इस पहलू पर विस्तार से दलील पेश करेंगे और उन्होंने 10 फरवरी तक का समय मांगा।
पीठ ने संकेत दिया कि वह दोनों पक्षों को सुनने के बाद 10 फरवरी को इस मुद्दे पर अपना फैसला सुरक्षित रखेगी।
शीर्ष अदालत तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिसमें विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने से इनकार करने पर राज्य विधानसभा और राज्यपाल के बीच लंबे समय से जारी टकराव को रेखांकित किया गया था।
संविधान का अनुच्छेद 200 राज्यपाल को राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने या अपने पास रोककर रखने की शक्ति देता है।
राज्यपाल पुनर्विचार के लिए विधेयक को विधानमंडल को वापस भी भेज सकते हैं या उसमें बदलाव का सुझाव दे सकते हैं।
पीठ ने कहा कि यह मुद्दा अनुच्छेद 200 से जुड़ा है और अगर अटॉर्नी जनरल की दलीलें मान ली जाएं तो राज्यपाल को अपनी मंजूरी रोककर रखने के लिए कोई सूचना देने की जरूरत नहीं है।
कुलपति की नियुक्ति से संबंधित विधेयक का जिक्र करते हुए अटॉर्नी जनरल ने कहा कि राज्य सरकार नियुक्ति प्रक्रिया से राज्यपाल को बाहर रखना चाहती है।
उन्होंने कहा कि राज्यपाल ने राज्य सरकार से कहा था कि यह केंद्रीय कानून और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियमन के खिलाफ है तथा इसके लिए खोज-सह-चयन समिति का गठन किया जाना चाहिए, लेकिन (राज्य) सरकार ने ऐसा नहीं किया और विधेयक को फिर से पारित कर दिया, जिसे अब राष्ट्रपति के विचारार्थ रखा गया है।
राज्यपाल द्वारा (विधेयक को) मंजूरी देने में देरी के कारण राज्य सरकार ने 2023 में शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया और दावा किया कि 2020 के एक विधेयक सहित 12 विधेयक उनके पास लंबित हैं।
तेरह नवंबर 2023 को राज्यपाल ने घोषणा की कि वे 10 विधेयकों को अपनी मंजूरी नहीं दे रहे हैं।
इसके बाद विधानसभा ने एक विशेष सत्र बुलाया और 18 नवंबर 2023 को उन विधेयकों को फिर से पारित किया।
राज्यपाल ने 28 नवंबर को कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ रख लिया था।
छह फरवरी को पीठ ने विधेयकों पर मंजूरी देने में राज्यपाल की ओर से की गई देरी पर सवाल उठाया था और कहा था कि ‘‘ऐसा लगता है कि उन्होंने खुद की प्रक्रिया अपनाई है।’’ साथ ही, न्यायालय ने मामले में निर्णय के लिए कुछ प्रश्न तैयार किए हैं।
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