जर्मनी और सीरिया : नए समीकरणों की तलाश

सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शारा जर्मनी की यात्रा पर पहुंचे.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शारा जर्मनी की यात्रा पर पहुंचे. यह यात्रा बताती है कि शरणार्थियों की वतन वापसी और क्षेत्रीय स्थिरता पर नीतियां किस तरह बदल रही हैं. जर्मनी चाहता है कि सीरियाई शरणार्थी अपने वतन लौट जाइस्लामिक मिलिशिया के पूर्व नेता और सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शारा का जर्मनी में भव्य स्वागत किया गया. बर्लिन में चांसलरी के आसपास का सरकारी इलाका 30 मार्च को बड़े पैमाने पर घेराबंदी में रहा. जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स (सीडीयू) और राष्ट्रपति फ्रांक-वाल्टर श्टाइनमायर, दोनों ने सीरिया के राष्ट्रपति अल-शारा का स्वागत किया.

इस विषय पर राजनीतिक विश्लेषकों के बीच असंतोष भी नजर आया. जर्मन टेबलॉइड 'बिल्ड' देश का सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला वाला अखबार है. 30 मार्च को 'बिल्ड' ने खबर छापी कि सीरियाई राष्ट्रपति बर्लिन के एक पांच‑सितारा होटल में ठहरे थे.

जर्मनी से सीरिया लौट रहे हैं शरणार्थी लेकिन संख्या कम

खबर की हेडलाइन में अल-शारा के दौरे को "इस साल की सबसे विवादास्पद राजकीय यात्रा" बताया गया. अखबार ने यह भी दावा किया कि उसे पता चला है, अल-शारा जब होटल पहुंचे तो समर्थकों ने "अल्लाहु अकबर" का नारा लगाकर उनका स्वागत किया.

मुश्किल संतुलन साधने की कोशिश कर रही है जर्मन सरकार

अल-शारा पर गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों का आरोप है. यह बशर अल असद को सत्ता से बाहर किए जाने के पहले के दौर की बात है. कुछ मामलों में तो उनपर बाद में भी ये आरोप लगते रहे हैं.

43 साल के अल-शारा अतीत में अल‑नुसरा फ्रंट का नेतृत्व कर चुके हैं. कभी यह फ्रंट अल-कायदा के आतंकी नेटवर्क का सहयोगी रहा था. इसके बावजूद, जर्मन सरकार के प्रवक्ता पिछले कई दिनों से इस बात पर जोर दे रहे हैं कि सीरिया के मामले में बातचीत के लिए मौजूदा अंतरिम राष्ट्रपति ही मुख्य संपर्क हैं.

ऐतिहासिक यात्रा पर अमेरिका पहुंचे सीरिया के राष्ट्रपति

बर्लिन और दमिश्क, दोनों साथ मिलकर जर्मनी में रह रहे सीरियाई लोगों को वतन वापस जाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. 30 मार्च को चांसलर मैर्त्स ने राष्ट्रपति अल-शारा के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इसमें उन्होंने जोर देते हुए कहा कि इस दिशा में दोनों देशों की अहम भूमिका है.

चांसलर ने यह भी बताया कि एक "संयुक्त टास्क फोर्स" बनाई जाएगी और "कुछ ही दिनों में" एक जर्मन प्रतिनिधिमंडल सीरिया का दौरा करेगा. मैर्त्स ने यह कहकर रिपोर्टरों को चौंका दिया कि वह चाहते हैं अगले तीन साल में 80 फीसदी सीरियाई लोग अपने देश लौट जाएं.

आईएस सदस्यों की वतन वापसी से चिंता में पड़े कई देश

मैर्त्स ने कहा कि असद के तख्तापलट और गृहयुद्ध की समाप्ति को एक साल से भी ज्यादा समय हो गया है और इस दौरान सीरिया में सामान्य स्थितियां "बुनियादी रूप से बेहतर" हो गई हैं. उन्होंने यह भी कहा कि जिन लोगों के पास अब जर्मनी में रहने की अनुमति नहीं है, उन्हें सीरिया लौट जाना चाहिए. चांसलर ने जोर दिया कि यह बात खासतौर पर उनके ऊपर लागू होती है, जो "जर्मनी की शरणागत व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं" और जर्मन कानूनों का पालन नहीं करते हैं.

जर्मनी में रह रहे लगभग 10 लाख सीरियाई नागरिक

लगभग 10 लाख सीरियाई जर्मनी में रह रहे हैं. इनमें से ज्यादातर 2011 में छिड़े गृहयुद्ध की वजह से अपना देश छोड़कर भाग आए थे. उनकी स्वदेश वापसी, कई महीने से जर्मन सरकार के भीतर ही विवादित मुद्दा बनी हुई है. माना जाता है कि जर्मनी में रह रहे सीरियाई लोगों में लगभग सात लाख ऐसे हैं, जो यहां शरण पाना चाहते हैं.

चांसलर मैर्त्स और बवेरिया की रूढ़िवादी क्रिश्चियन सोशल यूनियन (सीएसयू) के नेता व देश के गृह मंत्री अलेक्जांडर दोबरिंट दलील देते हैं कि अंतरिम राष्ट्रपति के कार्यभार संभालने के बाद दरअसल सीरियाई गृहयुद्ध खत्म हो गया है. ऐसे में, सीरिया के लोग देश लौट सकते हैं और उन्हें लौटना भी चाहिए.

सीरिया को कहां ले जाएंगे "आतंकवादी" से अंतरिम राष्ट्रपति बने अल शरा

मैर्त्स की ही पार्टी के नेता और जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल इससे सहमत नहीं दिखते. पिछले साल, वाडेफुल ने दमिश्क के एक बुरी तरह प्रभावित इलाके का दौरा किया. इसके बाद उन्होंने कहा "यहां लोगों के लिए गरिमापूर्ण तरीके से तकरीबन नामुमकिन है." बताया जाता है कि दमिश्क से लौटकर वाडेफुल ने सीडीयू/सीएसयू के संसदीय समूह से कहा कि अभी सीरिया की हालत 1945 के जर्मनी से भी बदतर नजर आती है.

उनके बयानों की अन्य रूढ़िवादी नेताओं ने तीखी आलोचना की. हालांकि, सीरियाई शरणार्थियों के लिए काम कर रहे गैर‑सरकारी संगठनों ने भी विदेश मंत्री की राय से सहमति जताई है. उनका मानना है कि फिलहाल किसी को सीरिया डिपोर्ट नहीं किया जाना चाहिए.

सीरिया पर गैर‑सरकारी संगठनों की राय

30 मार्च को कई एनजीओ ने रिपोर्टरों से कहा कि अंतरिम राष्ट्रपति अल-शारा की तमाम आलोचनाओं के बावजूद जर्मन सरकार द्वारा उन्हें बुलाना एक सही कदम है. जोफी बिशहॉफ, 'अडॉप्ट अ रेवॉल्यूशन' नाम के संगठन में काम करती हैं. 2011 में सीरिया के गृहयुद्ध के बाद इसका गठन हुआ था. वह बताती हैं कि सिविल सोसायटी के लिए स्थितियां अब भी मुश्किल हैं, "असद की सत्ता खत्म होने के बाद भी भयानक दमन हो रहा है."

सीरियाई शरणार्थियों को घर जाने की अनुमति देगा जर्मनी

'पीईएल‑सिविल वेव्स' के प्रमुख फरहाद अहमा ने जर्मन सरकार से सीरिया के पुनर्निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाने का आग्रह किया. उन्होंने नई सरकार से अपील की कि वह कुर्दों जैसे अल्पसंख्यकों पर अत्याचार न करे.

अहमा ने संवाददाताओं से कहा, "क्षेत्र में शांति स्थापित करने और आतंकवाद पर काबू पाने के लिए सीरिया, जर्मनी के लिए महत्वपूर्ण है. और, इन समस्याओं को तभी हल किया जा सकेगा, अगर सीरिया समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाला देश बने."

सीरिया में किस हाल में हैं अलग-अलग जातीय और धार्मिक समूहों के लोग?

जब अहमा से पूछा गया कि वह सीरिया लौटने पर अन्य सीरियाइयों को क्या सलाह देंगे, अहमा ने कहा कि लोगों को खुद सीरिया जाकर हालात का आकलन करना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा, "दशकों से निर्वासन में रह रहे बहुत से सीरियाइयों के लिए यह एक ऐतिहासिक क्षण है. कि वे (असद) सत्ता खत्म होने के बाद फिर से अपने देश की यात्रा करें और देखें कि वह सत्ता अब खत्म हो चुकी है."

हालांकि, सीरिया से भागकर जर्मनी में शरण लेने वाले बहुत से लोगों के लिए एक मुश्किल खड़ी हो सकती है: अगर वे अपने वतन लौटते हैं, भले ही थोड़े समय के लिए, तो जर्मनी में उन्हें मिला "संरक्षित दर्जा" खत्म होने का जोखिम है.

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