नयी दिल्ली, छह जनवरी दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि आपराधिक अदालतें किसी आरोपी या दोषी के अधिकारों की अनदेखी नहीं कर सकती हैं, ठीक उसी तरह जैसे वे पीड़ितों के अधिकारों की अनदेखी नहीं कर सकती हैं।
उच्च न्यायालय ने अपहरण के एक मामले में सजा के फैसले का इंतजार कर रहे तीन दोषियों को निचली अदालत द्वारा दी गई लंबी तारीख की निंदा करते हुए यह बात कही।
एक निचली अदालत ने 25 नवंबर, 2022 को अभियुक्तों को दोषी ठहराया और उन्हें हिरासत में ले लिया तथा सजा पर दलीलें सुनने के लिए चार फरवरी, 2023 की तारीख तय की। उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को इस बात पर विचार करते हुए कि कहा कि निचली अदालत ने अभियुक्तों के त्वरित सुनवाई के मूल्यवान अधिकार की पूरी तरह से अनदेखी की।
न्यायमूर्ति स्वर्णकांत शर्मा ने कहा, “आपराधिक अदालतें, हालांकि पीड़ित के अधिकारों पर विचार करने के लिए बाध्य हैं लेकिन इसके साथ ही वे किसी अभियुक्त या दोषी के अधिकारों की अनदेखी या उसे दरकिनार नहीं कर सकती हैं।”
उन्होंने कहा, “एक व्यक्ति जिसे दोषी ठहराया जाता है, उसे उच्च न्यायालय में सजा को चुनौती देने के साथ-साथ सजा के निलंबन की मांग करने का वैधानिक अधिकार होता है।”
न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा, “इस तरह के वैधानिक अधिकार का प्रयोग हालांकि केवल तभी किया जा सकता है जब संबंधित अदालत द्वारा सजा पर भी आदेश सुनाया जाता है, क्योंकि सजा मुकदमे में फैसले का एक हिस्सा है।”
उच्च न्यायालय ने कहा कि यह सुनिश्चित करना अदालतों का कर्तव्य है कि पीड़ित और अभियुक्तों के अधिकार संतुलित हों।
अदालत ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि संतुलन साधना बेहद प्रवीणता का काम है, हालांकि, आपराधिक न्याय प्रणाली के सिद्धांत की दरकार है कि कोई अभियुक्त जो न्यायिक हिरासत में है या आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे किसी भी अन्य व्यक्ति के मुकदमे की शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित कर मामले को तेजी से तार्किक अंजाम तक पहुंचाया जाए।
उच्च न्यायालय ने कहा, “इस संबंध में, संज्ञान में लाए गए तथ्यों के अवलोकन से पता चलता है कि निचली अदालत ने 25 नवंबर, 2022 को बेहद गैर-जिम्मेदाराना तरीके से आदेश पारित किया है।”
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