नयी दिल्ली, 17 मई उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को योग्यता-सह-वरिष्ठता के आधार पर अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश के पद पर पदोन्नति में दीवानी न्यायाधीशों (वरिष्ठ श्रेणी) को 65 प्रतिशत कोटा प्रदान करने की गुजरात उच्च न्यायालय की नीति को बरकरार रखा।
सेवा नियम 2005 के अनुसार, राज्य में अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश कैडर में 65 प्रतिशत रिक्तियां योग्यता-सह-वरिष्ठता चयन मानदंड के आधार पर राज्य में दीवानी न्यायाधीशों (वरिष्ठ श्रेणी) वाले फीडर कैडर से भरी जानी हैं।
प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि 2011 से गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा अपनाई गई पदोन्नति की प्रक्रिया से हटना न्यायिक अधिकारियों के लिए गंभीर पूर्वाग्रह का कारण बनेगा, जिनका उपयुक्तता परीक्षा में उच्च अंक प्राप्त करने के बावजूद उच्च न्यायिक सेवा में पिछली नियुक्तियों में चयन नहीं हो पाया।
पीठ ने कहा, ‘‘हमें गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा अपनाई गई पदोन्नति प्रक्रिया में कोई कमी नहीं लगती क्योंकि यह दोहरी आवश्यकताओं को पूरा करती है।’’
इसने कहा, ‘‘हालांकि, हम स्पष्ट करते हैं कि 65 प्रतिशत पदोन्नति कोटा के लिए, तुलनात्मक मूल्यांकन की आवश्यकता सहित न्यायिक अधिकारी की उपयुक्तता का आकलन करने के लिए अपने स्वयं के न्यूनतम मानक निर्धारित करना एक विशेष उच्च न्यायालय का काम है।"
शीर्ष अदालत ने गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले और इसके बाद 68 न्यायिक अधिकारियों को जिला न्यायाधीशों के पद पर पदोन्नत करने की राज्य सरकार की अधिसूचना पर लगाई गई रोक भी हटा दी।
इससे पहले, शीर्ष अदालत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को मानहानि मामले में दोषी ठहराने वाले सूरत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट हरीश हसमुखभाई वर्मा सहित गुजरात के 68 निचले न्यायिक अधिकारियों की पदोन्नति पर रोक लगा दी थी।
शीर्ष अदालत वरिष्ठ दीवानी न्यायाधीश कैडर अधिकारी रविकुमार महेता और सचिन प्रतापराय मेहता की याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें जिला न्यायाधीशों के उच्च कैडर में 68 न्यायिक अधिकारियों के चयन को चुनौती दी गई थी।
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