देश की खबरें | अदालत ने ईडब्ल्यूएस के लिए नवनिर्मित फ्लैट के आवंटन की प्रक्रिया बताने को कहा
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने अधिकारियों को उन नवनिर्मित फ्लैट के आवंटन के लिए अपनायी जाने वाली प्रक्रिया के संबंध में एक हलफनामा दाखिल करने का बुधवार को निर्देश दिया, जो समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए बनाए गए थे और खाली पड़े हैं।
नयी दिल्ली, छह जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने अधिकारियों को उन नवनिर्मित फ्लैट के आवंटन के लिए अपनायी जाने वाली प्रक्रिया के संबंध में एक हलफनामा दाखिल करने का बुधवार को निर्देश दिया, जो समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए बनाए गए थे और खाली पड़े हैं।
अदालत इस संबंध में स्वत: संज्ञान लेते हुए एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया कि बड़ी संख्या में नवनिर्मित मकान सुविधाओं की कमी के कारण या अधिकारियों के बीच समन्वय की कमी के कारण आंशिक रूप से निर्मित स्थिति में खाली पड़े हैं।
मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने कहा, ‘‘प्रतिवादियों ने अनुरोध किया है कि उन्हें खाली फ्लैट के आवंटन के लिए प्रक्रिया के बारे में एक हलफनामा दायर करने के वास्ते समय दिया जाए और उन्हें इसके लिए चार सप्ताह का समय दिया जाता है।’’
पीठ ने मामले को 22 अगस्त को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।
उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने इस साल जून में स्थिति का स्वत: संज्ञान लिया था। न्यायाधीश ने कहा था कि उनकी राय है कि इन फ्लैट को पूरा करने की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़नी चाहिए ताकि शहर में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों का विधिवत पुनर्वास किया जा सके और बनायी गई नीति के अनुसार ये फ्लैट उन्हें दिये जा सकें।
एकल न्यायाधीश ने कहा था, ‘‘इसे ध्यान में रखते हुए कि जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) योजना के तहत बड़ी संख्या में मकानों का निर्माण किया जाना था, जिसके लिए पहले ही पर्याप्त धन खर्च किया जा चुका है। इस अदालत की राय है कि इन मकानों को पूरा करने की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़नी चाहिए ताकि दिल्ली शहर में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों का विधिवत पुनर्वास किया जा सके और उन्हें तय की गई नीति के अनुसार इन मकानों की पेशकश की जा सके।’’
अदालत ने कहा था, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि दिल्ली में समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के निवासियों के एक बड़े वर्ग को किफायती आवास की आवश्यकता है। यह चिंताजनक है कि सुविधाओं की कमी के कारण या अधिकारियों के बीच समन्वय की कमी के कारण आंशिक रूप से पूर्ण होने की स्थिति में बड़ी संख्या में फ्लैट या मकान खाली पड़े हैं।’’
इसने कहा था कि केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के सचिव और दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव द्वारा पहले से दायर संयुक्त स्थिति रिपोर्ट को मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष भी रखा जाए।
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