ईयू कोर्ट का फैसला, लैंगिक हिंसा के आधार पर मिल सकता है शरणार्थी का दर्जा
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

यूरोपीय संघ की अदालत ने अपने ताजा फैसले में महिलाओं को एक सामाजिक समूह का हिस्सा माना है. ऐसे में, अगर यूरोपीय संघ के बाहर की कोई महिला यौन या घरेलू हिंसा की शिकार हो, तो उसे शरणार्थी का दर्जा दिया जा सकता है.अब शारीरिक या मानसिक हिंसा भी यूरोपीय संघ में शरण पाने का आधार होगी. यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस (ईसीजे) ने फैसला किया है कि ऐसी महिलाएं, जो अपनी पैदाइश के देश में लिंग के कारण "शारीरिक या मानसिक हिंसा" की शिकार हैं या उन्हें इससे खतरा है, वो यूरोपीय संघ में सुरक्षा मांग सकती हैं. इस आधार पर उन्हें शरणार्थी का दर्जा दिया जा सकता है. हिंसा की परिधि में यौन और घरेलू क्रूरता भी शामिल है.

ईसीजे ने जिस मामले में यह फैसला सुनाया है, वह तुर्की में रहने वाली कुर्द मूल की एक मुसलमान महिला से जुड़ा है. महिला का दावा था कि परिवार ने जबरन उसकी शादी करवाई. पति ने उसे धमकाया और मारपीट की. महिला अपने पति को छोड़कर बुल्गारिया भाग आई. उसका कहना है कि अगर वो लौटकर तुर्की गईं, तो उनकी जिंदगी पर खतरा होगा. इसीलिए उन्होंने बुल्गारिया में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवेदन दिया. वहां से ये मामला ईसीजे पहुंचा.

"एक सामाजिक समूह हैं महिलाएं"

17 जनवरी को ईसीजे ने अपने फैसले में कहा कि शरणार्थी का दर्जा "ऐसे मामलों में दिया जाता है, जब किसी और देश के नागरिक को नस्ल, धर्म, नागरिकता, राजनीतिक विचार या किसी खास सामाजिक समूह में सदस्यता से जुड़े कारणों के आधार पर सताया जाता है."

अदालत ने कहा कि महिलाओं को एक सामाजिक समूह के तौर पर देखा जा सकता है. ऐसे में, शारीरिक और मानसिक हिंसा से जुड़ी खास परिस्थितियां लागू होने पर शरणार्थी का दर्जा दिया जा सकता है. अदालत ने यह भी कहा कि अगर रिफ्यूजी का दर्जा मिलने की शर्तें पूरी नहीं होती, तो महिलाएं "अतिरिक्त सुरक्षा दिए जाने की पात्र मानी जा सकती हैं, खासतौर पर तब जब उनपर मारे जाने या हिंसा की शिकार होने का वास्तविक खतरा हो."

महिला सुरक्षा की दिशा में अहम फैसला

टेरी राइनट्के, यूरोपीय संसद में जर्मनी की सांसद और ग्रीन्स ग्रुप की उपाध्यक्ष हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा कि यह फैसला "घरेलू और यौन हिंसा से सुरक्षा की दिशा में बेहद अहम है." राइनट्के कहती हैं कि इस फैसले से यह भी स्पष्ट हुआ कि ईयू को घरेलू हिंसा के खिलाफ उन महिलाओं की भी हिफाजत करनी होगी, जिनके पास ईयू का पासपोर्ट नहीं है.

यूरोपीय संसद में पोलैंड के सांसद रॉबर्ट बिएद्रॉन महिला अधिकारों और लैंगिक समानता समिति के अध्यक्ष हैं. उन्होंने अदालत के फैसले को "शरणार्थी नीति में समावेशी और संवेदनशील रवैये को बढ़ावा देने की दिशा में अहम कदम बताया."

काउंसिल ऑफ यूरोप का "इस्तांबुल समझौता" महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा और घरेलू अत्याचार का विरोध करता है. जून 2023 में ईयू ने इसे आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया था. इसका मकसद महिलाओं को हिंसा से बचाना और पीड़ितों की हिफाजत करना है. हालांकि ईयू के सभी देश इस पर दस्तखत कर चुके हैं, लेकिन बुल्गारिया, चेक रिपब्लिक, हंगरी, लिथुआनिया और स्लोवाकिया ने अब तक इसे कानूनी शक्ल नहीं दी है.

ईयू की सांसद राइनट्के कहती हैं कि ईयू द्वारा इंस्ताबुल समझौते को मंजूर किए जाने की वजह से ही ईसीजे से आया फैसला मुमकिन हो पाया. वहीं पोलिश सांसद बिएद्रॉन कहते हैं कि ईयू द्वारा इंस्ताबुल समझौते को स्वीकार करना "महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा खत्म करने यूरोपीय संघ की तत्परता का प्रतीक है."