नई दिल्ली, 22 मई: भारत के उत्तरी, केंद्रीय और पूर्वी हिस्सों में जहां इस समय भीषण लू (Heatwave) का प्रकोप जारी है, वहीं अंतरराष्ट्रीय मौसम विज्ञानियों (International Meteorologists) की एक चेतावनी ने देश की चिंता बढ़ा दी है. अमेरिकी एजेंसी 'राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन' (National Oceanic and Atmospheric Administration) (NOAA) ने मई और जुलाई 2026 के बीच प्रशांत महासागर में एक मजबूत 'अल नीनो' (El Nino) की स्थिति बनने की संभावना जताई है. इस प्राकृतिक घटना के कारण भारत में इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून के कमजोर रहने और सूखे जैसी स्थिति पैदा होने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है. यह स्थिति देश के कृषि उत्पादन, जल उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकती है. यह भी पढ़ें: El Nino Risk: मानसून 2026 पर अल नीनो का साया, भारत में इस साल सामान्य से कम बारिश का अनुमान, खेती और अर्थव्यवस्था पर बढ़ सकता है दबाव
क्या है ENSO और यह कैसे काम करता है?
'अल नीनो साउदर्न ऑसिलेशन' (ENSO) प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान और वायुमंडलीय दबाव में होने वाला एक आवधिक (Periodic) बदलाव है. इसके तीन चरण होते हैं: अल नीनो (गर्म चरण), ला नीना (ठंडा चरण) और तटस्थ (न्यूट्रल) चरण.
तटस्थ परिस्थितियों में, 'वाकर सर्कुलेशन' (Walker Circulation) नामक एक पैटर्न के तहत व्यापारिक हवाएं (Trade Winds) भूमध्य रेखा के साथ पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं। इससे इंडोनेशिया के पास पश्चिमी प्रशांत महासागर का पानी गर्म रहता है, जबकि दक्षिण अमेरिका के पास पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी ठंडा रहता है. इस ठंडे पानी के कारण समुद्र की गहराइयों से पोषक तत्वों से भरपूर पानी ऊपर आता है (Upwelling), जो समुद्री पारिस्थितिकी और मत्स्य पालन के लिए बेहतरीन माना जाता है.
कैसे पैदा होती है 'अल नीनो' की स्थिति?
जब पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली व्यापारिक हवाएं कमजोर हो जाती हैं या अपनी दिशा बदल लेती हैं, तो प्रशांत महासागर का गर्म पानी पूर्व (दक्षिण अमेरिका की ओर) इकट्ठा होने लगता है. इस बदलाव के कारण वैश्विक स्तर पर मौसम का चक्र बिगड़ जाता है.
इस दौरान पश्चिमी प्रशांत महासागर (जैसे ऑस्ट्रेलिया और एशिया) में उच्च वायुदाब के कारण सूखे जैसी स्थिति बन जाती है, जबकि पूर्वी प्रशांत में कम दबाव का क्षेत्र बनता है। वायुदाब के इसी उतार-चढ़ाव को 'साउदर्न ऑसिलेशन' कहा जाता है. 'अल नीनो' शब्द का इस्तेमाल पहली बार 1600 के दशक में दक्षिण अमेरिकी मछुआरों द्वारा किया गया था, जिसका स्पैनिश में अर्थ 'बाल ईसा' (क्राइस्ट चाइल्ड) होता है, क्योंकि यह घटना आमतौर पर क्रिसमस के आसपास अपने चरम पर होती है. यह स्थिति हर दो से सात साल में एक बार पैदा होती है और 12 से 18 महीनों तक बनी रह सकती है.
वैज्ञानिक कैसे करते हैं इसकी निगरानी?
एनओएए (NOAA) मुख्य रूप से तीन सूचकांकों के जरिए इसकी ट्रैकिंग करता है:
- ओशनिक नीनो इंडेक्स (ONI): यह प्रशांत महासागर के 'नीनो 4' क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान के औसत बदलाव को मापता है. यदि तापमान सामान्य से +0.5°C या उससे अधिक लगातार पांच अवधियों तक बना रहे, तो इसे अल नीनो माना जाता है.
- साउदर्न ऑसिलेशन इंडेक्स (SOI): यह ताहिती और डार्विन (ऑस्ट्रेलिया) के बीच समुद्र के स्तर के दबाव के अंतर को ट्रैक करता है.
- रिलेटिव ओशनिक नीनो इंडेक्स (RONI): यह सबसे आधुनिक सूचकांक है जो वैश्विक वार्मिंग के प्रभाव को समायोजित करते हुए सटीक पूर्वानुमान प्रदान करता है.
तापमान में बढ़ोतरी के आधार पर अल नीनो को कमजोर (0.5°C से 1°C), मध्यम (1°C से 1.5°C), मजबूत (1.5°C से 2°C) और अत्यधिक मजबूत (2°C या अधिक) श्रेणियों में बांटा जाता है. अत्यधिक मजबूत स्थिति को 'सुपर अल नीनो' भी कहा जाता है.
भारत के लिए क्यों बड़ा खतरा है अल नीनो?
भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था पूरी तरह से दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर है. ऐतिहासिक आंकड़े गवाह हैं कि 1950 के बाद से आए 16 अल नीनो वर्षों में से 7 वर्षों में भारत को गंभीर सूखा या कम बारिश का सामना करना पड़ा है.
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अप्रैल 2026 के अपने पूर्वानुमान में इस साल दीर्घकालिक औसत की तुलना में केवल 92 प्रतिशत (सामान्य से कम) बारिश होने की बात कही है. इससे पहले 2015-16 में आए 'सुपर अल नीनो' के दौरान भारत में केवल 86 प्रतिशत बारिश हुई थी, जिससे फसलों को भारी नुकसान पहुंचा था.
कमजोर मानसून के कारण फसलों की पैदावार घट सकती है, जिससे खाद्य सामग्री की कीमतें बढ़ेंगी (महंगाई) और ग्रामीण आय पर दबाव आएगा. इसके अलावा, पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव के कारण ईंधन और उर्वरक आपूर्ति में बाधा आने से यह आर्थिक संकट और गहरा सकता है.
त्वरित कदम उठाने की आवश्यकता
यद्यपि अल नीनो एक प्राकृतिक घटना है और इसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन समय रहते तैयारी करके इसके प्रभावों को कम किया जा सकता है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सूखा-प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा देना, बुवाई के समय में बदलाव करना, भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) और जल संरक्षण को प्राथमिकता देना इस संकट से निपटने के सबसे प्रभावी उपाय हैं. राज्यों को अभी से अपनी 'हीट' और 'ड्रॉट' (सूखा) एक्शन प्लान को अंतिम रूप देना होगा.












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