महर्षि वाल्मीकि रामायण (रामकथा) के रचयिता ही नहीं थे, वे उस युग के नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक आदर्शों के संरक्षक भी थे. उनके और श्रीराम के बीच का संबंध केवल पात्र और लेखक का नहीं, बल्कि एक गूढ़ आध्यात्मिक संवाद जैसा था, जहां एक महर्षि ने ईश्वर को मानव रूप में देखा, और फिर उस कथा को अमर कर दिया.
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