आज विश्व के विभिन्न देशों में द्रुत गति से हिंदी का प्रसार हो रहा है. वास्तव में भाषा, किसी भी सीमा में आबद्ध नहीं हो सकती. निरंतर प्रवाहमान भाषा ही विकसित और परिष्कृत होती है. हिंदी विश्वभाषा की क्षमताओं से संपन्न है. व्यापार,कृषि, उद्योग, मनोरंजन,अध्ययन-अध्यापन और विमर्श की भाषा हिंदी सभी सीमाओं को पार कर बढ़ती ही जा रही है.
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