प्रकृति हो अथवा मानव जीवन, समाज हो या देश, इनकी सुरक्षा एवं संरक्षा तभी तक संभव है, जब उनमें पर्याप्त संतुलन बना रहे. पर्यावरण के बिगड़ते स्वरूप के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हम सब ही हैं. जिस तरह से हमने प्रकृति प्रदत्त उपहारों का जरूरत से ज्यादा दोहन किया है, वैध अथवा अवैध तरीकों से हरे-भरे जंगलों को कंक्रीट के जंगलों में तब्दील किया...
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