तीव्र औद्योगीकरण, शहरों के विस्तार, कृषि भूमि और जंगलों के अतिक्रमण ने पूरे विश्व में प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है. उस लापरवाह उपभोक्तावाद को जोड़ें जिसने हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को जहर दिया है और कई प्रजातियों को विलुप्त होने के कगार पर धकेल दिया है.
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