इस आंदोलन के दौरान लोगों ने वृक्षों को प्यार करने तथा उन्हें बचाने का संदेश देने के लिए उन्हें अपने गले से लगाया और इसीलिए इसे 'चिपको' नाम दिया गया. यह उस कृतज्ञता की अभिव्यक्ति भी थी जो जंगल मनुष्यों को ऑक्सीजन, लकड़ी, आश्रय और दवाओं के रूप में देता है. बहुगुणा के करीबी सहयोगी याद करते हैं कि वह कहा करते थे कि 'प्रकृति को कुचलने से विकास नहीं हो सकता.'
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