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Anti-Defection Law: तृणमूल कांग्रेस में मची बड़ी बगावत; 'असली टीएमसी' के दावों के बीच दल-बदल कानून के 'ग्रे ज़ोन' पर छिड़ी नई कानूनी बहस

तृणमूल कांग्रेस (TMC) में अब तक का सबसे बड़ा आंतरिक संकट खड़ा हो गया है. पार्टी के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों और 80 में से करीब 60 विधायकों ने बगावत कर दी है. इस सामूहिक दलबदल ने भारत के दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों और उसकी व्याख्या को लेकर एक नई देशव्यापी कानूनी बहस को जन्म दे दिया है.

Anti-Defection Law: तृणमूल कांग्रेस में मची बड़ी बगावत; 'असली टीएमसी' के दावों के बीच दल-बदल कानून के 'ग्रे ज़ोन' पर छिड़ी नई कानूनी बहस
ममता बनर्जी (Photo Credits: IANS)

नई दिल्ली, 16 जून: भारतीय राजनीति के इतिहास में क्षेत्रीय दलों के बिखराव की सूची में अब तृणमूल कांग्रेस (TMC) का नाम भी जुड़ता नजर आ रहा है. पश्चिम बंगाल (West Bengal) की सत्ताधारी पार्टी इस समय अपने सबसे गंभीर आंतरिक संकट से गुजर रही है, जहां पार्टी के भीतर दो अलग-अलग धड़े खुद को "असली तृणमूल" बता रहे हैं. टीएमसी के कुल 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने बगावत करते हुए एक अल्पपरिचित दल 'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) का दामन थाम लिया है. वहीं, पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी पार्टी के 80 विधायकों में से लगभग 60 विधायक मूल संगठन से अलग हो गए हैं. इस बड़े विद्रोह ने देश के दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की सीमाओं और उसकी व्याख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक नया कानूनी संकट खड़ा कर दिया है.

पार्टी के भीतर यह असंतोष पिछले कुछ समय से नेतृत्व को लेकर चल रहे विवादों, विशेषकर पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव के विरोध के चलते गहराया है. साल 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना करने वालीं ममता बनर्जी फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम पर गहरी नजर रखे हुए हैं, जबकि दोनों बागी धड़े कानूनी कार्रवाई से बचने के रास्ते तलाश रहे हैं. यह भी पढ़ें: Egg Attack on Kunal Ghosh: कोलकाता में ममता बनर्जी के घर के बाहर टीएमसी नेता कुणाल घोष पर फेंका गया अंडा, सुरक्षाकर्मियों ने युवक को पकड़ा (Watch Video)

क्या कहता है कानून और बागियों का दावा?

इस पूरे मामले में कानूनी विशेषज्ञ इस बात को लेकर बंटे हुए हैं कि क्या बागी सांसदों और विधायकों का यह कदम उन्हें संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) के तहत अयोग्य घोषित होने से बचा पाएगा या नहीं. बागी गुट दल-बदल विरोधी कानून के 'पैराग्राफ 4' का हवाला दे रहा है। यह प्रावधान कहता है कि यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) विधायक या सांसद किसी दूसरी पार्टी में विलय (Merger) के लिए सहमत हो जाते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता.

चूंकि लोकसभा में टीएमसी के दो-तिहाई से अधिक सांसद और विधानसभा में भी दो-तिहाई के करीब विधायक अलग हुए हैं, इसलिए वे खुद को सुरक्षित मान रहे हैं. बागी सांसद सुदीप बंदोपाध्याय ने स्पष्ट किया है कि वे तकनीकी रूप से NCPI के साथ विलय कर रहे हैं, लेकिन आगामी मानसून सत्र में वे संसद के भीतर "असली तृणमूल" के रूप में ही अपनी पहचान रखेंगे. वहीं विधानसभा में बागियों ने निष्कासित नेता रीताब्रता बनर्जी को विपक्ष का नेता चुनकर खुद को ही मूल टीएमसी घोषित कर दिया है.

दल-बदल कानून का 'ग्रे ज़ोन' और सुप्रीम कोर्ट के फैसले

इस विवाद ने इस कानून के एक बड़े 'ग्रे ज़ोन' (अस्पष्ट क्षेत्र) को उजागर किया है. कई कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि पैराग्राफ 4 में प्रयुक्त "पार्टी" शब्द का अर्थ मूल 'संगठन' से है, न कि केवल उसके निर्वाचित 'विधायकों या सांसदों' से. उनका कहना है कि कानून के तहत मूल राजनीतिक दल का विलय होना जरूरी है, न कि केवल उसके सदन के सदस्यों का.

इस संदर्भ में दो अलग-अलग अदालती उदाहरणों ने असमंजस को और बढ़ा दिया है:

  • गोवा केस (2022): बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने फैसला दिया था कि यदि दो-तिहाई विधायक दल छोड़ते हैं, तो उसे वैध विलय माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अभी अंतिम फैसला नहीं दिया है.
  • शिवसेना-एनसीपी केस (2023): महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की थी कि विधायी दल (Legislature Party) अपने मूल संगठन (Political Party) की इच्छा के विरुद्ध स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकता.

आगे की राह और देश की राजनीति पर असर

यह मामला अब उस निर्णायक मोड़ पर है जहां सुप्रीम कोर्ट का आने वाला रुख यह तय करेगा कि क्या "दो-तिहाई विलय" के नियम का उपयोग सामूहिक दलबदल के लिए एक कानूनी चोर-दरवाजे (Loophole) के रूप में किया जा सकता है, या फिर यह वास्तव में किसी वैचारिक मतभेद के समय सामूहिक राजनीतिक पुनर्गठन का एक वैध माध्यम है.

अदालत के सामने यह भी एक यक्ष प्रश्न है कि क्या कोई बागी समूह किसी ऐसी पार्टी में शामिल होकर विलय का दावा कर सकता है जिसका पहले से संसद या विधानसभा में कोई प्रतिनिधित्व ही न हो.  फिलहाल, ममता बनर्जी के सामने न केवल अपने संगठन की साख बचाने की चुनौती है, बल्कि वे एक ऐसी कानूनी लड़ाई के मुहाने पर खड़ी हैं जो भविष्य में भारत की दलबदल संबंधी न्यायशास्त्र की पूरी परिभाषा को बदल सकती है.

(The above story first appeared on LatestLY on Jun 16, 2026 08:19 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).