विदेश की खबरें | वायरस की उत्पत्ति का पता लगाना क्यों है मुश्किल

पेन्सिलवेनिया (अमेरिका), 11 जून (द कन्वरसेशन) हर बार जब कोई बड़ी बीमारी का प्रकोप होता है, तो वैज्ञानिकों और जनता का पहला सवाल होता है: ‘‘यह कहाँ से आया?’’

कोविड-19 जैसी महामारियों को भविष्य में फैलने से रोकने और महामारियों की भविष्यवाणी करने के लिए, शोधकर्ताओं को उन वायरस की उत्पत्ति का पता लगाने की आवश्यकता है, जो इन बीमारियों के संक्रमण का कारण बनते हैं। यह कोई आसान काम नहीं है। दुनिया भर में फैलने के 20 साल बाद आज तक एचआईवी की उत्पत्ति स्पष्ट नहीं है। वैज्ञानिक अभी भी इबोला की उत्पत्ति के बारे में नहीं जानते हैं, भले ही यह 1970 के दशक से समय-समय पर महामारी का कारण बना है।

वायरल पारिस्थितिकी के विशेषज्ञ के रूप में, मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि वैज्ञानिक वायरस की उत्पत्ति का पता कैसे लगाते हैं। अपने काम में, मुझे कई नए वायरस और कुछ जाने-माने रोगजनक मिले हैं जो बिना किसी बीमारी के जंगली पौधों को संक्रमित करते हैं। पौधे, जानवर या इंसान, तरीके काफी हद तक एक जैसे हैं। एक वायरस की उत्पत्ति का पता लगाने में व्यापक फील्डवर्क, पूरी तरह से प्रयोगशाला परीक्षण और काफी हद तक भाग्य का संयोजन शामिल है।

वायरस जंगली जानवरों के जरिए इनसानों में आते हैं

कई वायरस और अन्य रोग कारक जो लोगों को संक्रमित करते हैं, वे जानवरों में उत्पन्न होते हैं। ये रोग पशुजनित कहलाते हैं, जिसका अर्थ है कि वे जानवरों के वायरस के कारण होते हैं जो इनसानों तक पहुंचे और फिर मानव आबादी के माध्यम से फैलने के लिए अनुकूलित हुए।

पहले ज्ञात मानव संक्रमण के स्थान पर बीमार जानवरों का परीक्षण करके वायरल की उत्पत्ति खोज शुरू करना आसान लग सकता है, लेकिन जंगली जानवर अक्सर कोई लक्षण नहीं दिखाते हैं।

वायरस और उनके मेजबान समय के साथ एक-दूसरे के अनुकूल हो जाते हैं, इसलिए वायरस अक्सर तब तक स्पष्ट रोग लक्षण नहीं पैदा करते जब तक कि वे एक नई मेजबान प्रजाति में नहीं आ जाते। शोधकर्ता सिर्फ बीमार जानवरों की तलाश नहीं कर सकते।

एक और समस्या यह है कि लोग और उनके द्वारा खाए जाने वाले जानवर स्थिर नहीं हैं। जिस स्थान पर शोधकर्ता पहले संक्रमित व्यक्ति को ढूंढते हैं, जरूरी नहीं कि वह उस स्थान के करीब हो जहां सबसे पहले वायरस उभरा था।

कोविड-19 के मामले में, चमगादड़ एक स्पष्ट पहली जगह थी। वे कई कोरोनावायरसों के लिए जाने जाते हैं और सार्स और मर्स जैसे अन्य पशुजनित रोगों के संभावित स्रोत हैं।

सार्स-कोव-2, जो वायरस कोविड-19 का कारण बनता है, के अध्ययन से वैज्ञानिकों ने अब तक पाया है कि बैटकोव आरएटीजी13 इसका सबसे करीबी स्वरूप है। यह वायरस 2011 और 2012 में वुहान वायरोलॉजी इंस्टीट्यूट के वायरोलॉजिस्ट द्वारा खोजे गए बैट कोरोनावायरसों के संग्रह का हिस्सा है।

2003 में सार्स-कोव-1 महामारी के बाद वायरोलॉजिस्ट चमगादड़ में सार्स से संबंधित कोरोनावायरस की तलाश कर रहे थे। उन्होंने वुहान में संस्थान की प्रयोगशाला से लगभग 932 मील (1,500 किलोमीटर) दूर युन्नान प्रांत में एक साइट पर चमगादड़ के मल के नमूने और गले के स्वाब एकत्र किए। वे आगे के अध्ययन के लिए वह नमूने बुहान की प्रयोशाला में वापस लाए।

यह जांचने के लिए कि क्या चमगादड़ का कोरोनावायरस लोगों में फैल सकता है, शोधकर्ताओं ने युन्नान नमूनों से बंदर के गुर्दे की कोशिकाओं और मानव के ट्यूमर से निकाली गई कोशिकाओं को संक्रमित किया।

उन्होंने पाया कि एकत्र किए गए नमूनों में से कई वायरस मानव कोशिकाओं में अपनी संख्या बढ़ा सकते हैं, जिसका अर्थ है कि वे संभावित रूप से बिना किसी मध्यवर्ती मेजबान के सीधे चमगादड़ से मनुष्यों में प्रेषित हो सकते हैं। हालांकि, चमगादड़ और लोग अक्सर सीधे संपर्क में नहीं आते हैं, इसलिए एक मध्यवर्ती मेजबान की अभी भी काफी संभावना है।

निकटतम रिश्तेदारों को ढूँढना

अगला कदम यह निर्धारित करना है कि एक संदिग्ध वन्यजीव वायरस मनुष्यों को संक्रमित करने वाले वायरस के कितना निकट है। वैज्ञानिक ऐसा वायरस के आनुवंशिक अनुक्रम का पता लगाकर करते हैं, जिसमें बुनियादी बिल्डिंग ब्लॉक्स, या न्यूक्लियोटाइड्स का क्रम निर्धारित करना शामिल है, जो जीनोम बनाते हैं। जितने अधिक न्यूक्लियोटाइड दो आनुवंशिक अनुक्रम साझा करते हैं, वे उतने ही निकट से संबंधित होते हैं।

चमगादड़ कोरोनवायरस आरएटीजी13 के आनुवंशिक अनुक्रमण ने इसे सार्स-कोव-2 से 96% से अधिक मिलता जुलता दिखाया। समानता के इस स्तर का मतलब है कि आरएटीजी13, सार्स-कोव-2 के काफी करीबी रिश्तेदार है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि सार्स-कोव-2 की उत्पत्ति शायद चमगादड़ों में हुई है, लेकिन अभी भी यह सिद्ध करना बहुत मुश्किल है कि यही इसका प्रत्यक्ष पूर्वज है। एक और मेजबान होने की संभावना अभी बनी हुई है, जिसने चमगादड़ से वायरस को पकड़ा और इसे मनुष्यों तक पहुँचाया।

इसी तरह, जब दक्षिणी चीन में तस्करी विरोधी अभियान में जब्त किए गए पैंगोलिन में एक संबंधित कोरोनावायरस की पहचान की गई, तो कई लोग इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सार्स-कोव-2 चमगादड़ से पैंगोलिन में पहुंचा और फिर वहां से मनुष्यों में आया। हालांकि पैंगोलिन वायरस और सार्स-कोव-2 के बीच केवल 91% समानता पाई गई, जो इसके मानव वायरस का प्रत्यक्ष पूर्वज होने की संभावना को खत्म करता है।

वायरल उत्पत्ति और इसके मानव तक पहुंचने की पहेली को सुलझाने के लिए, वैज्ञानिकों को न केवल लापता टुकड़ों को ढूंढना है, बल्कि यह भी पता लगाना है कि वे सभी एक साथ कैसे फिट होते हैं। इसके लिए मानव संक्रमणों से वायरल नमूने एकत्र करने और उन आनुवंशिक अनुक्रमों की एक दूसरे से और अन्य पशु-व्युत्पन्न वायरस से तुलना करने की आवश्यकता है।

इसके अलावा इस बात को लेकर भी बहस चल रही है कि वायरस किसी जानवर से इनसानों तक पहुंचा या लैब से लीक होकर इनसानों तक पहुंचा। हाल ही में 18 प्रमुख वायरोलॉजिस्ट ने लैब से इस वायरस के फैलाव की जांच का सुझाव दिया है। हालांकि आरएटीजी13 के साथ इसका मिलान होने के बाद इसके लैब में बनाए जाने की संभावना बहुत कम हो जाती है।

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