फर्जी डिग्री के आधार पर नियुक्ति के मामले में हस्तक्षेप करने से अदालत का इनकार

न्यायमूर्ति सूर्य प्रकाश केसरवानी ने नीलम चौहान और अन्य लोगों द्वारा दायर याचिकाओं को निस्तारित करते हुए निर्देश दिया कि बीएड की फर्जी डिग्री या अंकपत्रों के आधार पर नियुक्ति प्राप्त करने वाले लोग अवैध एवं धोखाधड़ी से नियुक्ति पाने के लाभार्थी बने। इसलिए इस तरह की नियुक्ति शुरुआत से ही शून्य है।

जमात

प्रयागराज, 29 अप्रैल इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बुधवार को दिए एक फैसले में बीएड की फर्जी डिग्री के आधार पर सरकारी स्कूलों में सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्ति पाने वाले लोगों की नियुक्ति रद्द करने के मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

न्यायमूर्ति सूर्य प्रकाश केसरवानी ने नीलम चौहान और अन्य लोगों द्वारा दायर याचिकाओं को निस्तारित करते हुए निर्देश दिया कि बीएड की फर्जी डिग्री या अंकपत्रों के आधार पर नियुक्ति प्राप्त करने वाले लोग अवैध एवं धोखाधड़ी से नियुक्ति पाने के लाभार्थी बने। इसलिए इस तरह की नियुक्ति शुरुआत से ही शून्य है।

यह निर्णय देते हुए अदालत ने कहा, "सहायक अध्यापक के पद पर याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति के लिए निःसंदेह बीएड आवश्यक योग्यता थी। फर्जी विद्यार्थियों की सूची में शामिल याचिकाकर्ताओं ने फर्जी बीएड डिग्रियों के आधार पर सहायक अध्यापक के पदों पर सरकारी नियुक्ति हासिल की है।"

इसने कहा, "यह एक धोखाधड़ी का कार्य है। इसलिए फर्जी बीएड डिग्री के आधार पर सरकारी नौकरी प्राप्त करने वाले याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति की प्रक्रिया विकृत है।"

अपने 228 पेज के निर्णय में अदालत ने निर्देश दिया कि संबंधित जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी इन अध्यापकों के खिलाफ कानून के मुताबिक आगे की कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगे।

रिट याचिका दाखिल करने वाले ये याचिकाकर्ता राज्य सरकार के विभिन्न स्कूलों में सहायक अध्यापक थे। एक समय उच्च न्यायालय के आदेश पर इस मामले की जांच के लिए विशेष जांच टीम गठित की गई थी जिसने 14 अगस्त, 2017 को अपनी रिपोर्ट में फर्जी डिग्रियों और अंकपत्रों और छेड़छाड़ की गई डिग्रियों एवं अंकपत्रों का विवरण दिया।

जांच टीम की रिपोर्ट के बाद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारियों ने इन याचिकाकर्ताओं को नोटिस जारी कर उनसे पूछा कि क्यों न उनकी नियुक्तियां निरस्त कर दी जाएं। इसके बाद प्रतिवादी डॉक्टर भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा ने फर्जी डिग्री वाले सभी विद्यार्थियों को नोटिस जारी किया था।

अदालत ने डॉक्टर भीम राव अंबेडकर विश्वविद्यालय को भी इस मामले में छह महीने के भीतर कानून के मुताबिक संपूर्ण प्रक्रिया पूरी कर तार्किक आदेश पारित करने और उसे अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्देश दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि विश्वविद्यालय कार्यवाही के बाद लिए गए निर्णय की एक प्रति उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा बोर्ड के सचिव, संबंधित याचिकाकर्ताओं और संबद्ध जिला बेसिक शिक्षा अधिकारियों को भेजेगा।

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