देश की खबरें | बुद्धदेव दासगुप्ता: एक कवि-फिल्मकार जो सिनेमा को आगे बढ़ाने की सीख दे गए

कोलकाता, 10 जून कवि, प्रोफेसर और फिल्म निर्माता, बुद्धदेव दासगुप्ता समकालीन भारत की सबसे अहम सिनेमाई आवाजों में से थे। उनकी फिल्मों में गीतात्मकता और उनकी सामाजिक चिंताओं के साथ कुछ हास्य होता था।

दासगुप्ता का 77 वर्ष की उम्र में बृहस्पतिवार को निधन हो गया। उन्होंने फिल्म निर्माण के अपने सफर की शुरुआत उस समय की थी जब न सिर्फ बंगाल, बल्कि भारतीय सिनेमा के दो महान फिल्मकार सत्यजीत रे और मृणाल सेन अपनी रचनात्मकता के शीर्ष पर थे। मगर उनकी अपनी शैली थी और वह अपनी खुद की फिल्में बनाने के लिए जल्द ही उनकी विशाल छाया से निकल आए।

‘गृहजुद्ध, ‘बाघ बहादुर’जैसी फिल्म बनाने वाले दासगुप्ता ने फिल्मी दुनिया में अपना करियर बनाने के लिए अर्थशास्त्र के प्रोफेसर की नौकरी छोड़ दी थी। यही नहीं, फिल्म जगत का रास्ता चुनने को लेकर उनके डॉक्टर पिता ने ऐतराज़ जताया था।

वह कभी एक फिल्मकर के तौर पर प्रशिक्षित नहीं हुए, उनके पास कल्पना थी और एक कवि की गीतात्मकता थी और इसे सिनेमा में बदलने का हुनर था। यह उनके चार दशक लंबे करियर में दिखा जिसमें उनकी फिल्में मानवता की जटिल परतों और समाज के साथ व्यक्ति के संबंधों का पता लगाती दिखती थी।

बृहस्पतिवार को भारतीय सामानंतर सिनेमा की प्रमुख आवाज़ शांत हो गई। दासगुप्ता का काफी दिनों तक गुर्दे की बीमारी से जूझने के बाद बृहस्पतिवार सुबह दिल का दौरा पड़ने से कोलकाता के कालीकपुर इलाके में स्थित उनके आवास पर निधन हो गया और वह सुबह छह बजे अपनी पत्नी सोहिनी को मृत मिले।

उन्होंने 1978 में ‘दूरतवा’ बनाई थी जो राजनीति विज्ञान के एक उदार प्रोफेसर की कहानी की पड़ताल करती है, जो राजनीतिक विश्वासों में संकट का सामना करते हैं और उनकी शादी भी टूट जाती है। फिल्म बड़ी चतुराई से 1970 के दशक के कोलकाता में नक्सल आंदोलन के साथ व्यक्तिगत कहानी को जोड़ती है। इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार मिले थे और बंगाली सिनेमा के परिदृश्य में एक फिल्म निर्माता के रूप में उनका आगमन पुख्ता हुआ।

दासगुप्ता की दूसरी फीचर फिल्म ‘नीम अन्नापुर्णा’ है जो एक ग्रामीण परिवार की कहानी है जो बेहतर भविष्य की तलाश में कोलकाता चला जाता है लेकिन लगातार परेशानियों का सामना करता है।

निर्देशक की सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली फिल्म ‘ गृहजुद्ध’ और ‘बाघ बहादुर’ है। ‘ गृहजुद्ध’ एक फैक्ट्री के मालिक और श्रमिक संघ के बीच संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती है।

दासगुप्ता ने कहा था कि उन्होंने सिनेमा के प्रति प्रेम की वजह से फिल्म निर्माण की ओर रुख किया और लेकिन बर्दवान विश्वविद्यालय और कलकत्ता विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में काम करने के वर्षों बाद उन्हें इस लगाव का एहसास हुआ।

दासगुप्ता ने राज्यसभा टीवी को ‘गुफ्तगू’ के लिए दिए साक्षात्कार में कहा था, “ जब मैंने अपने पिता से कहा कि मैं पुणे फिल्म संस्थान जाना चाहता हूं, तो उन्होंने इसका कड़ा विरोध किया। यह मेरे लिए दर्दनाक था लेकिन मुझे अर्थशास्त्र से भी प्यार था। मैंने अर्थशास्त्र पढ़ाया लेकिन एक समय ऐसा आया जब मैंने फैसला किया कि मैं इसे जारी नहीं रख सकता क्योंकि मुझे फिल्में बनानी हैं।”

वर्ष 1944 में स्वतंत्रता से पूर्व भारत के पुरुलिया जिले के एक गांव में जन्मे दासगुप्त बंगाल के जंगलमहल क्षेत्र की लाल मिट्टी को नहीं भूल पाए जो बाद में उनकी कई फिल्मों की पृष्ठभूमिक बन गई।

कवि-फिल्म निर्माता के पिता तारकान्त दासगुप्ता रेलवे में एक डॉक्टर थे। जब वह सिर्फ 12 साल के थे, तब कोलकाता चले गए, लेकिन पुरुलिया और बीरभूम जिलों ने उनकी कई फिल्मों की पृष्ठभूमि के रूप में काम किया।

उनके निर्देशन में बनीं कुछ प्रसिद्ध फिल्मों में ‘नीम अन्नपूर्णा’, ‘गृहजुद्ध’, ‘बाघ बहादुर’, ‘तहादेर कथा’,‘चाराचर’, ‘लाल दर्जा’, ‘उत्तरा’, ‘स्वपनेर दिन’, ‘कालपुरुष’ और ‘जनाला’ शामिल है। उन्होंने दो हिंदी फिल्में ‘अंधी गली’ और ‘अनवर का अजब किस्सा’ भी बनाई।

दासगुप्ता को उनकी फिल्मों के लिए 12 राष्ट्रीय पुरस्कर मिले। वह उदार विचारों रखते थे और उन्होंने देश में हाल के दिनों में कई अधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की आलोचना की थी।

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