देश की खबरें | बोंगांव: मतुआ समुदाय के गढ़ में सीएए को लेकर मुसलमानों में मतभेद

बोंगांव (पश्चिम बंगाल), 15 मई सीएए को आकार देने वाले नागरिकता आंदोलन का केंद्र माने जाने वाले मतुआ समुदाय के गढ़ बोंगांव में मुस्लिम समुदाय के बीच विभिन्न प्रकार की मान्यताएं, आकांक्षाएं और मतभेद हैं।

मूल रूप से पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से संबंध रखने वाला हिंदू शरणार्थी समुदाय मतुआ लंबे समय से बोंगांव के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में एक प्रमुख शक्ति रहा है। नागरिकता अधिकारों के संघर्ष में इस समुदाय की जड़ें गहरी हैं और सीएए इनके लिए उम्मीद की किरण है जिसमें बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के सताए हुए हिंदू अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है।

हरे-भरे खेतों और सामुदायिक रूप से एकजुट माने जाने वाले भारत-बांग्लादेश सीमा से सटे इस क्षेत्र में फिलहाल ध्रुवीकरण का असर साफ देखा जा सकता है क्योंकि राजनीतिक दल विवादास्पद मुद्दों पर विरोधाभासी रुख अपना रहे हैं, साथ ही राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) की आशंकाएं भी बढ़ रही हैं।

इस माहौल के विपरीत, बोंगांव की मुस्लिम आबादी सीएए को लेकर अनिश्चितता का सामना कर रही है, जिससे उनकी चुनौतियां बढ़ गई हैं।

एक ओर कुछ लोग इसे (सीएए) उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों की मदद के लिए एक उदार अधिनियम के रूप में देखते हैं, तो वहीं दूसरी ओर इसे भेदभाव का एक तरीका माना जाता है, जो पहले से मौजूद सामाजिक-धार्मिक तनाव को और बढ़ा रहा है।

बोंगांव में भारत-बांग्लादेश सीमा के पास मल्लिकपुर गांव के अमीरुल मंडल (62) ने कहा, "सीएए की क्या जरूरत है जब हम सभी यहां के नागरिक हैं। हम अपना वोट कैसे डाल सकते हैं और हमारे पास सभी जरूरी दस्तावेज कैसे हैं?"

वर्षों से यहां खेती कर रहे मिंटू रहमान नामक किसान ने कई लोगों के डर को व्यक्त किया। उन्होंने सवाल किया, ''मुसलमानों को निशाना क्यों बनाया जा रहा है, जबकि उनकी जड़ें इस मातृभूमि से जुड़ी हैं? यह भेदभावपूर्ण है कि सीएए में मुसलमानों को हटा दिया गया है। अधिनियम के तहत सभी धर्मों को शामिल किया जाना चाहिए था।”

बोंगांव में मुस्लिम समुदाय में मतभेद स्पष्ट है, जो सीएए को लेकर व्यापक राष्ट्रीय विमर्श को प्रतिबिंबित करता है।

एक ओर वे लोग हैं जो इस अधिनियम का पुरजोर विरोध करते हुए इसे राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर हमला मानते हैं। उनका तर्क है कि सीएए से मुसलमानों को स्पष्ट रूप से बाहर करके संविधान में निहित समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन किया गया है, जिससे पहले से ही संवेदनशील समुदाय हाशिए पर चला गया है।

इसके विपरीत, बोंगांव में ऐसे मुसलमान भी हैं, जो न चाहते हुए भी सीएए के प्रति मौन समर्थन व्यक्त करते हैं। अमीरुल दफादार ने ‘पीटीआई-’ से कहा, ''सीएए पड़ोसी देशों के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों के लिए है। यह कानून नागरिकता देने को लेकर है, इसे छीनने के लिए नहीं। हमारे जैसे मुस्लिम जो पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं, इस देश के नागरिक हैं।''

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